॥ सांख्येश्वरनिर्णय॥
आर्यावर्तीय दार्शनिक परम्परा अनादिकाल से परम तत्त्व के अनुसन्धान में प्रवृत्त रही है। यहाँ दर्शन का प्रयोजन केवल बौद्धिक कौतूहल की तुष्टि न होकर जीव के दुःखनिवृत्ति तथा मोक्षसिद्धि का मार्ग प्रशस्त करना रहा है। इस महान चिन्तनधारा में विविध दर्शनों ने अपने-अपने अभिप्राय से जगत्, जीव तथा परमसत्ता के पारस्परिक सम्बन्ध का निरूपण किया है। ‘तेषु षड्दर्शनानां मध्ये सांख्यदर्शनं प्राचीनत्व’ तत्त्वमीमांसात्मकता तथा युक्तिपरकता की दृष्टि से विशेष गौरव का अधिकारी माना गया है।
सांख्यदर्शन का मुख्य प्रयोजन सृष्टि के तत्त्वों का संख्यानुसार विवेचन कर प्रकृति और पुरुष के स्वरूप का यथार्थ निर्णय करना है। इस दर्शन में प्रकृति को समस्त कार्यजगत् का मूल कारण तथा पुरुष को चेतन साक्षीस्वरूप तत्त्व माना गया है। प्रकृतिपुरुषविवेक के माध्यम से जीव के बन्धन तथा मोक्ष का निरूपण करना ही सांख्य का प्रमुख अभिप्राय है।
तथापि सांख्यदर्शन के स्वरूप के सम्बन्ध में प्राचीनकाल से एक विशेष प्रकार का मतभेद प्रचलित रहा है। कतिपय विद्वान् सांख्य को निरीश्वरवादी दर्शन के रूप में निरूपित करते रहे हैं तथा यह प्रतिपादन करते हैं कि सांख्यदर्शन जगत्सृष्टि के निमित्त ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। उत्तरकालीन कतिपय भाष्यकारों तथा व्याख्याताओं ने सांख्यकारिका के ‘सांख्य विरुद्ध’ वचनों के आधार पर इस मत का प्रतिपादन किया, मेरे अनुसार इसका नाम सांख्यकारिका ना होकर असांख्यकारिका होना चाहिए। क्योंकि इसने कारिका में जो मूल सांख्य के विरूद्ध जो ‘मुंह से मल’ किया है वह किसी भी प्रकार सांख्य परम्परा में स्वीकार्य योग्य नहीं है। और इन्ही मल रूपी पुस्तकों के परिणामस्वरूप सामान्य विद्वत्समाज में यह धारणा स्थिर होती चली गई कि सांख्यदर्शन स्वभावतः ईश्वरनिरपेक्ष है।
किन्तु यदि सांख्यदर्शन की मूल परम्परा, कपिलमुनिप्रदत्त उपदेश, महाभारत तथा गीता आदि ग्रन्थों का सम्यगवलोकन किया जाए, तो यह निष्कर्ष सर्वथा निर्विवाद प्रतीत नहीं होता। सांख्यदर्शन का उद्गम जिन महर्षि कपिल से स्वीकार किया जाता है, भारतीय परम्परा में उनका स्वरूप केवल दार्शनिक आचार्य के रूप में ही नहीं, अपितु दिव्यदर्शी तत्त्वज्ञ ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित है। प्राचीन ग्रन्थों में कपिलप्रणीत सांख्य का जो स्वरूप प्रतिपादित हुआ है, वह केवल तत्त्वगणना तक सीमित न होकर परम तत्त्व की प्राप्ति का साधनरूप ज्ञानमार्ग के रूप में प्रकट होता है।
विशेषतया यह उल्लेखनीय है कि मूल सांख्यपरम्परा में ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण माना गया है। सांख्यदर्शन जहाँ प्रकृति को जगत् का उपादान कारण स्वीकार करता है, वहीं सृष्टि के प्रवर्तन और नियमन के लिए चेतन तत्त्व की आवश्यकता का प्रतिषेध नहीं करता। यदि प्रकृति सर्वथा जड़ है, तो उसकी सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध तथा उद्देश्यपूर्ण सृष्टि-प्रक्रिया किसी चेतन नियामक सत्ता के अभाव में किस प्रकार सम्भव हो सकती है? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उपस्थित होता है। प्राचीन सांख्यपरम्परा इस प्रश्न की उपेक्षा नहीं करती, अपितु अनेक स्थलों पर प्रकृति के प्रवर्तन में चेतन सान्निध्य की स्वीकृति प्रदान करती है।
दर्शन में उपादान तथा निमित्त कारण का भेद सुप्रसिद्ध है। उपादान कारण वह तत्त्व है जिससे सृष्टि की सामग्री का उद्भव होता है, तथा निमित्त कारण वह है जो सृष्टि के प्रवर्तन, नियमन और व्यवस्था का हेतु होता है। सांख्यदर्शन यदि प्रकृति को उपादान कारण स्वीकार करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकाल लेना कि वह निमित्त कारणरूप ईश्वर की सत्ता को सर्वथा अस्वीकार करता है, यह दार्शनिक दृष्टि से शीघ्रताजन्य निर्णय प्रतीत होता है। अपितु यह अधिक युक्तिसंगत जान पड़ता है कि जड़ प्रकृति का सुसंगठित प्रवर्तन किसी चेतन नियामक सत्ता की सन्निधि में ही सम्भव है।
सांख्य को निरीश्वरवादी सिद्ध करने की प्रवृत्ति प्रायः ईश्वर की संकीर्ण परिभाषा पर आधारित रही है। जहाँ ईश्वर को केवल प्रत्यक्ष सृष्टिकर्ता के रूप में सीमित कर दिया गया, वहाँ सांख्य द्वारा प्रकृति की स्वतन्त्र कार्यशक्ति का प्रतिपादन ईश्वरनिषेध के रूप में ग्रहण कर लिया गया। ऐसा प्रतीत होता है मानो कतिपय व्याख्याकारों ने सांख्य के विशाल तात्त्विक भवन का केवल एक अंश दृष्टिगत कर सम्पूर्ण स्वरूप का निर्णय कर लिया हो। दर्शन जैसे गम्भीर विषय में इस प्रकार का एकांगी अवलोकन अनेक भ्रान्त धारणाओं को जन्म देता है।
योगदर्शन और सांख्यदर्शन का पारस्परिक सम्बन्ध इस विषय में विशेष विचारणीय है। योगदर्शन सांख्य की तात्त्विक संरचना को स्वीकार करते हुए ईश्वर को ‘पुरुषविशेष’ के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यदि सांख्य की मूल प्रवृत्ति ईश्वरनिषेधात्मक होती, तो योगदर्शन का यह प्रतिपादन दार्शनिक रूप से असंगत होता। इससे यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि सांख्य की मूल भावना ईश्वर के प्रतिषेध में न होकर तत्त्वज्ञान की स्वतंत्र स्थापना में ही होगी।
भगवद्गीता में सांख्य और योग को एक ही परम सत्य के दो भिन्न मार्गों के रूप में निरूपित किया गया है। गीता में सांख्यज्ञान को ब्रह्मविद्या का अविभाज्य अंग माना गया है तथा उसे भगवान् के तत्त्वज्ञान से पृथक् नहीं किया गया। यदि सांख्य का स्वरूप ईश्वरविरोधी होता, तो गीता में उसे आध्यात्मिक ज्ञानमार्ग के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त होना दुरूह प्रतीत होता।
कभी-कभी यह भी प्रतीत होता है कि सांख्य को निरीश्वरवादी सिद्ध करने का प्रयत्न तत्त्वचिन्तन की गम्भीर परम्परा की अपेक्षा वादप्रधान प्रवृत्ति का परिणाम रहा है। कतिपय व्यक्तियों ने सांख्य के कतिपय वचनों को ग्रहण कर यह निष्कर्ष निकाल दिया कि ईश्वर की सत्ता सांख्य में सर्वथा अस्वीकार है। यह स्थिति ऐसी प्रतीत होती है मानो कोई जिज्ञासु समुद्र के तट से जल का स्पर्श मात्र कर उसकी समग्र गहराई का अनुमान कर ले।
प्रस्तुत लेख का उद्देश्य इसी जटिल विषय का सम्यक् परीक्षण करना है। इसमें सांख्यदर्शन की मूल परम्परा, कपिलमुनि का तत्त्वोपदेश विवेचन किया जाएगा। इन समस्त प्रमाणों के आधार पर यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया जाएगा कि सांख्यदर्शन को निरीश्वरवादी मान लेना गलत है। अतः “सांख्येश्वरनिर्णय” विषयक यह लेख भारतीय तत्त्वचिन्तन की समन्वयी परम्परा के आलोक में सांख्यदर्शन के वास्तविक स्वरूप के पुनर्विचार का एक विनीत प्रयास है।
॥ षष्टितंत्र और ईश्वर॥
सत्त्वरजस्तमसांसाम्यावस्थाप्रकृतिः,प्रकृते महान्महतोऽहङ्कारः अहङ्कारात्पञ्च तन्मात्राण्युभयमिन्द्रियंतन्मात्रभ्येःस्थूलभूतानिपुरुषः इतिपञ्चविंशतिर्गणः॥ ६१॥ [षष्टितन्त्र १/६१]
भाष्य— सत्त्व, रज, तम, इन तीनों गुणों की साम्यावस्था अर्थात् समानभाव से रहने का नाम “प्रकृति" है अर्थात् कार्य को प्राप्त न होने वाले उक्त तीनों गुणों का नाम "प्रकृति” है, जो अन्य पदार्थों का उपादानकारण हो अर्थात् जिससे पदार्थों की उत्पत्ति हो उसको “प्रकृति” कहते हैं । प्रकृति, प्रधान, अव्यक्त और उक्त तीनों गुणों की साम्यावस्था, यह सब पर्याय शब्द हैं। प्रकृति से महत्तत्त्व=बुद्धितत्त्व अर्थात् प्रकृति का प्रथम कार्य उत्पन्न हुआ, महत्तत्त्व से अहङ्कार अहङ्कार=बुद्धित्तत्व का एक विशेष परिणाम, अहङ्कार से शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, यह पञ्चतन्मात्र, और श्रोत्र, त्वक् चक्षु, जिह्वा, घ्राण यह पांच ज्ञानेन्द्रिय तथा वाळू, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, यह पांच कर्मेन्द्रिय और मन उत्पन्न हुआ, सांख्य सिद्धान्त में उक्त दशों को बाह्येन्द्रिय और मन को आभ्यन्तर इन्द्रिय कहते हैं और शब्दादि पञ्चतन्मात्रों से यथाक्रम आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, यह पांच स्थूलभूत उत्पन्न हुए, पुरुष शब्द से जीव ईश्वर दोनों का ग्रहण है, पुरुष न किसी का कारण और न कार्य है, उसका ग्रहण यहां केवल सांख्य मत में माने हुए तत्वों की संख्या पूरा करने के लिये है, इस प्रकार सांख्य मत में पञ्चविंशति तत्त्व माने हैं।
शंका— पुरुष शब्द से आपने ईश्वर का ग्रहण कैसे किया?
चूंकि चेतन अथवा पुरूष कहने से दोनों ही तत्त्वों जीव और ईश्वर का स्वभावतः ग्रहण हो जाता है। जैसे जड़ जगत कहने से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ग्रहण करते हैं ना कि केवल पृथ्वी को कर लिया और अन्य तारामण्डलों को छोड़ दिया जड़ कहने से ही प्रकृति तथा उसके समस्त विकारों का ग्रहण हो जाता है क्योंकि सत्व रज तम जड़ हैं और परमाणु आदि भी जड़ हैं। इसी प्रकार दोनों ही जीव और ईश्वर चेतन हैं दोनों स्वरूपतः एक हैं इसलिए पुरूष से दोनों का ही ग्रहण होगा देखो अथर्ववेद में भी कहा है—
न वै तं चक्षुर्जहाति न प्राणो जरसः पुरा। पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते॥ ३०॥ [अथर्ववेद १०/२/३०]
व्याख्या— निश्चय से उसे जरावस्था से पूर्व न दृष्टि ना प्राण त्यागता है जो कि शरीर को ब्रह्म की पुरी के रूप में जान लेता है। जिस के सम्बन्ध से ब्रह्म पुरुष कहा जाता है।
उक्त मन्त्र का गम्भीर अवलोकन करने पर यह तथ्य स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि वैदिक वाङ्मय में ‘पुरुष’ शब्द का प्रयोग अत्यन्त व्यापक अर्थ में किया गया है। वहाँ पुरुष का तात्पर्य केवल जीवात्मा तक सीमित नहीं रहता, अपितु वह उस परम चेतन सत्ता का भी द्योतक है जिसके अधिष्ठान में समस्त चेतन प्रवृत्तियाँ संचालित होती हैं। वैदिक परम्परा में पुरुष को ब्रह्म का विशेष स्वरूप कहा गया है, जो शरीररूपी पुरी में स्थित होकर उसे चेतना प्रदान करता है। इससे यह संकेत मिलता है कि पुरुष शब्द का प्रयोग बहु चेतन सत्ता के लिए किया जाता रहा है। षष्टितंत्र में ‘पुरुष’ का ग्रहण केवल तत्त्वसंख्या की पूर्ति के लिए कहा गया है, तथापि यह कथन केवल संख्यानात्मक औपचारिकता तक सीमित नहीं माना जा सकता। सांख्य का सम्पूर्ण तत्त्वचिन्तन चेतन और जड़ के द्वैत पर आधारित है। जब चेतन तत्त्व को ‘पुरुष’ कहा जाता है, तब उसके अन्तर्गत चेतन सत्ता के विविध स्तरों का ग्रहण होता है। जीव और ईश्वर में भेद स्वीकार करने पर भी दोनों को चेतनस्वरूप समान माना गया है। इसी कारण पुरुष शब्द में जीव और ईश्वर दोनों का समावेश स्वीकार किया है।
यदि पुरुष केवल जीवात्मा तक सीमित माना जाए, तो यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जीव स्वयं बन्धनग्रस्त और अविद्याग्रस्त होते हुए प्रकृति के सार्वभौमिक संचालन का आधार किस प्रकार बन सकता है। फिर यह कहना कि जीव और प्रकृति के सान्निध्य से सृष्टि बन गया यह तो वही बात है कि जैसे कोई सामान्य चीजों का बोक्ष उठाने वाले गद्हे को कहे कि आज तुम्हें पूरी पृथ्वी उठानी है अथवा यह तो गद्हे पर ब्रह्माण्ड लादने जैसा है।
दूसरी बात यह है कि यदि जीवात्मा और प्रकृति के सान्निध्य से सृष्टि बनी तो प्रलयकाल में जीवात्मा बद्ध था या मुक्त? कहोगे मुक्त था तो उसको सृष्टि की आवश्यकता ही क्या? और यदि बद्ध था तो किसके बद्ध था? क्योंकि जगत तो है नहीं?
और बात यह है कि सांख्य में ‘पुरुषबहुत्व’ को स्वीकार किया है तो कौन सा वह विशिष्ट जीवात्मा था जो प्रकृति के सान्निध्य में आया? अथवा आप जीवात्मा को विभु मानते हैं? जैसा कि 'चुटकीदीपिका' (युक्तिदीपिका) और ‘असांख्यकारिका’ में माना है? फिर तो आपका मत सांख्य है ही नहीं जो कि मैं ऊपर ही कह आया हूँ यह तो आप केवल सांख्य के नाम पर छद्म मायावाद की दुहाई दे रहे हैं।
सांख्यदर्शन में प्रकृति को स्वतन्त्र उपादान कारण स्वीकार किया गया है, किन्तु उसका स्वतः प्रवर्तन स्वीकार नहीं किया है। षष्टितन्त्र के उक्त सूत्र का एक अन्य पक्ष भी विचारणीय है। वहाँ तत्त्वों की गणना करते समय प्रकृति से लेकर स्थूलभूतों तक सम्पूर्ण सृष्टि का क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया गया है। यह क्रम अत्यन्त सुव्यवस्थित और तर्कसम्मत है। इस क्रमबद्धता से यह संकेत मिलता है कि सृष्टि केवल अराजक घटनाओं का समूह नहीं है, अपितु उसमें किसी प्रकार की बौद्धिक व्यवस्था निहित है। ऐसी व्यवस्था की स्वीकृति अप्रत्यक्ष रूप से किसी चेतन नियामक सत्ता की सम्भावना को इंगित करती है। और यह बौद्धिक व्यवस्था सांख्य दर्शन की प्राचीन ऋषि कृत व्याख्याओं मे निर्विवाद रूप से स्वीकार किया गया है। विवाद का विषय तो यह होना चाहिए की ‘ईश्वरकृष्ण’ सांख्य की परम्परा से था या ‘मायावादी’ था क्योंकि कारिका मे तो उसने मायावाद की ही पूंछ पकड़ी है।
सांख्य की तत्त्वमीमांसा में पुरुष की निष्क्रियता का प्रतिपादन किया गया है, किन्तु यह निष्क्रियता पूर्ण निरपेक्षता का द्योतक नहीं है। पुरुष का सान्निध्य ही प्रकृति में क्रियाशीलता का कारण बनता है। कुछ विद्वानों ने यह आपत्ति प्रस्तुत की है कि सांख्य में ईश्वर का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, अतः वहाँ ईश्वरस्वीकृति का अभाव है। किन्तु दार्शनिक परम्परा में अनेक बार तत्त्वों का प्रत्यक्ष उल्लेख न होते हुए भी उनका संकेतार्थ स्वीकृत किया गया है। सांख्य का मुख्य उद्देश्य तत्त्वगणना और विवेकज्ञान की स्थापना है। परंतु फिर भी सांख्य में ईश्वर का उल्लेख जिस स्पष्टता से है वैसा उल्लेख तो अन्य दर्शनों मे भी नहीं है। षष्टितन्त्र की शैली सूत्रात्मक है, जहाँ अत्यल्प शब्दों में अत्यन्त व्यापक तत्त्वज्ञान का संकेत किया जाता है। सूत्रग्रन्थों की परम्परा में अनेक तत्त्वों का विस्तार भाष्य और व्याख्या में किया जाता रहा है। इस दृष्टि से पुरुष शब्द का व्यापक अर्थ ग्रहण करना दार्शनिक परम्परा के अनुकूल ही है।
आगे प्रत्यक्षप्रमाण का लक्षण करते हुए भगवान कपिल लिखतें हैं—
यत् सम्बद्धं सत् तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत् प्रत्यक्षम्॥ ८६॥ [षष्टितन्त्र १/८६]
भाष्य— अन्तःकरण के प्रकाशक परिणाम का नाम “वृत्ति" है। जैसे तालाब का जल छिद्रद्वारा निकलकर नालीस्वरूपभूत हुआ क्षेत्र में प्रवेश करके उसके समानाकार होजाता है इसी प्रकार अन्तःकरण भी चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा निकलकर घटादि विषयदेश को प्राप्त हुआ उसके समानाकार परिणाम को प्राप्त होता है इसी का नाम “वृत्ति" है। जब चक्षुरादि इन्द्रियों का विषय के साथ सम्बन्ध होता है तब घटोयम्=यह घट है, पटोयम्=यह पट है, इस प्रकार विषय के समानाकार अन्तःकरण की वृत्ति को "प्रत्यक्ष प्रमाण" कहते हैं।
शंका— योगी को इन्द्रिय सम्बन्ध से बिना भी अतीतानागत वस्तुओं का प्रत्यक्ष होने से उक्त लक्षण योगी के प्रत्यक्ष में नहीं घट सक्ता ? उत्तर—
योगिनामवाह्यप्रत्यक्षत्वान्नदोषः॥ ९०॥ [षष्टितन्त्र १/९०]
भाष्य— योगी को अतीत, अनागत, समीपस्थ तथा दूरस्थ पदार्थों का योगज सामर्थ्य से प्रत्यक्ष होता है अर्थात् इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध से विना भी योगज सामर्थ्यद्वारा योगी सर्व पदार्थों का हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष कर लेता है, अतएव कोई दोष नहीं।
लीनवस्तुलब्धातिशयसम्बन्धाद्वाऽदोषः॥ ९१॥ [षष्टितन्त्र १/९१]
भाष्य— अतीतानागत तथा व्यवहित विषयों के प्रत्यक्ष करने के लिये योगी के इन्द्रियों में योगबल से दिव्य शक्ति उत्पन्न होजाती है जिस से उसको अतीतानागत आदि विषयों का प्रत्यक्ष होजाता है। तात्पर्य यह है कि योगद्वारा दिव्यशक्ति वाले योगी के इन्द्रियों का विषय के साथ सम्बन्ध होकर प्रत्यक्ष होता है इसलिये प्रयक्ष के लक्षण में उक्त दोष नहीं आता।
शंका— उक्त प्रत्यक्ष ईश्वर को न होगा क्योंकि उसके इन्द्रिय नहीं ? उत्तर—
ईश्वरासिद्धेः॥ ९२॥ [षष्टितन्त्र १/९२]
भाष्य— हमने जो प्रत्यक्ष का लक्षण किया है वह जन्यप्रत्यक्ष का लक्षण है अर्थात् जो पहले न होकर फिर हो उसको "जन्यप्रत्यक्ष” कहते हैं और ईश्वर में ऐसा कोई ज्ञान नहीं जो न होकर हो क्यों कि उसका ज्ञान नित्य है, इसलिये प्रत्यक्ष की ईश्वरमें असिद्धि नहीं। और बात यह है कि जब वह सर्वशक्तिमान् और सर्वथा स्वतन्त्र है तो फिर उसका ज्ञान पुरुष के समान इन्द्रियों के अधीन नहीं हो सकता, इस प्रकार विवेचन करने से ‘ईश्वर में उक्त दोष की सर्वथा असिद्धि है’।
यही वह सूत्र है जिसके आधार पर निरीश्वर वाद का इतना विशाल भवन खड़ा कर दिया गया है। जबकि क्रम से पूर्वापर सूत्रों पर विचार करें तो यह सिद्धांत यहां ठहरता है कि जिस जन्यप्रत्यक्ष प्रमाण की बात सूत्रकार कहते हैं उस जन्यप्रत्यक्ष प्रमाण की ईश्वर में असिद्धि है, इसकारण यह सूत्र का विशेष रचन हुआ अन्यथा प्रमाणों के लक्षण प्रसंग में ईश्वर को सिद्ध अथवा असिद्ध करना प्रसंगविरूद्ध हो। मुख्य बात यह है कि यह जन्यप्रत्यक्ष ईश्वर में असिद्ध है क्योंकि ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियों के अधीन नहीं है।
आगे सांख्य में स्वयं ईश्वर असिद्धि विषयक पूर्वपक्ष रख उसका समाधान करते हैं—
मुक्तबद्धयोरन्यतराभावान्नतत्सिद्धिः॥ ९३॥ [षष्टितन्त्र १/९३]
भाष्य— यदि ईश्वर को मुक्तस्वभाव माना जाय तो उससे सृष्टि की रचना नहीं हो सकती और बद्ध मानाजाय तो उसमें ईश्वरपन नहीं हो सकता, एवं दोनों प्रकार से ईश्वर की सिद्धि नहीं होती।
अब उक्त शंका का समाधान करते हैं—
उभयथाप्यसत्करत्वम्॥ ९४॥ [षष्टितन्त्र १/९४]
भाष्य— दोनों प्रकार से भी आपका कथन ठीक नहीं, क्योंकि—
मुक्तात्मनःप्रशंसोपासासिद्धस्य वा॥ ९५॥ [षष्टितन्त्र १/९५]
भाष्य— मुक्तस्वभाव परमात्मा की प्रशंसा पाई जाती है और सृष्टिकर्त्ता परमात्मा की (उपासा) उपासना पाई जाती है। किसमें पाई जाती है ? श्रुति में देखो— ‘स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः’॥ [यजु ४०/८] इत्यादि मंत्रों में मुक्तस्वरूप परमात्मा का वर्णन पाया जाता है। और ‘पूर्णात्पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते। उतो तदद्य विद्याम यतस्तत्परिषिच्यते’॥ [अथर्व १०/८/२९] तथा— ‘तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्। तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥ इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद’॥ [ऋग १०/१२९/३,७] इत्यादि श्रुति मे सृष्टिकर्त्ता परमात्मा की उपासना पाई जाती है। यहाँ श्रुति अर्थ इसलिए होगा क्योंकि सांख्य श्रुति को स्वतः प्रमाण मानता है जिसका निरूपण आगे करेंगे।
तात्पर्य यह है कि परमात्मा सर्वदुःखनिवृत्त, सर्वोपाधिविलक्षण तथा सर्वथा असङ्ग होने के कारण स्वभावतः मुक्त कहा गया है। उसके स्वरूप में न तो कर्मजन्य बन्धन का संस्पर्श सम्भव है और न ही किसी प्रकार का कर्तव्यबोधजनित क्लेश। अतः मुक्तत्व के प्रतिपादन में किसी प्रकार का दोष या विरोधाभास उपस्थित नहीं होता। परमात्मा की मुक्तावस्था उसकी स्वाभाविक, नित्य एवं अविकार्य सत्ता का द्योतक है, जो न काल से बाधित होती है, न कर्म से, और न ही प्रकृति के गुणों से।
इसी प्रकार यदि परमात्मा को सृष्टिकर्ता स्वीकार किया जाता है, तो भी उसमें किसी प्रकार का बन्धन-दोष आरोपित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका कर्तृत्व सांसारिक जीवों के कर्तृत्व के समान कर्मफल-आश्रित या बाध्यकारी नहीं है। जीव जब कर्ता बनता है, तब वह अविद्या, राग, द्वेष तथा कर्मवासनाओं से प्रेरित होकर क्रिया करता है, फलतः वह कर्मबंधन में आबद्ध हो जाता है। परन्तु परमात्मा का कर्तृत्व न तो अविद्याजन्य है और न ही किसी अपूर्णता की पूर्ति के हेतु प्रवृत्त होता है। उसका कर्तृत्व पूर्ण स्वातन्त्र्य, सर्वज्ञता तथा सर्वशक्तिमत्ता से सम्पन्न है।
यही भाव वेदान्त के प्रसिद्ध सिद्धान्त “लोकवत्तु लीला कैवल्यम्” [ब्रह्मसूत्र २।१।३३] में प्रतिपादित किया गया है। परमात्मा अपनी स्वतन्त्र इच्छा से, अपनी माया अथवा प्रकृति के माध्यम से जगत् की अभिव्यक्ति करता है, परन्तु उस सृष्टि-व्यापार से उसकी नित्यमुक्त, निरपेक्ष एवं अखण्ड सत्ता में किंचित् भी परिवर्तन नहीं होता। अतः यह सिद्ध होता है कि परमात्मा का मुक्तत्व और कर्तृत्व परस्पर विरोधी नहीं हैं, अपितु उसकी पूर्ण सत्ता के दो भिन्न आयाम हैं एक ओर वह सर्वथा असङ्ग, निरपेक्ष और मुक्त है, तथा दूसरी ओर अपनी अनन्त शक्ति और स्वेच्छा से जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार का विधान करता है। इस प्रकार परमात्मा का कर्तृत्व बन्धनरहित, स्वातन्त्र्यमूलक है।
वृत्तिकार अनिरुद्ध द्वारा ईश्वरनिराकरण के समर्थन में जो यह आपत्ति प्रस्तुत की गई है कि “कर्त्ता सदैव शरीरी होता है” वह युक्तिसंगत नहीं है, लौकिक दृष्टान्त के आधार पर यह कहा जाता है कि घट आदि कार्यों का कर्ता कुलाल (कुम्हार) होता है, और वह शरीरधारी होता है; अतः जहाँ कर्तृत्व है, वहाँ शरीरीत्व अनिवार्य है यह तर्क प्रथम दृष्ट्या आकर्षक अवश्य है, परन्तु यह सार्वत्रिक नियम सिद्ध नहीं करता।
प्रथम तो यह विचारणीय है कि सांख्य परम्परा स्वयं प्रकृति को जगत् का उपादानकारण स्वीकार करती है और साथ ही उसे निरवयव, अचेतन तथा शरीररहित भी मानती है। यदि कर्तृत्व अथवा कार्योत्पादन के लिए शरीरीत्व अनिवार्य ही माना जाए, तो प्रकृति द्वारा जगत् की उत्पत्ति का सिद्धान्त भी संकट में पड़ जाता है। क्योंकि यदि शरीरधारण ही सृष्टि-समर्थता की अनिवार्य शर्त हो, तो निरवयव और अचेतन प्रकृति स्वयं सृष्टि-प्रक्रिया को कैसे सम्पन्न कर सकेगी?
यदि इसके उत्तर में यह कहा जाए कि कुम्हारादि की भाँति निमित्तकारण अवश्य शरीरी होता है और प्रकृति केवल उपादानकारण होने के कारण सूक्ष्म तथा निरवयव रहकर भी कार्य का आधार बन सकती है, तो यह भी पूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता। कारण यह है कि सामान्य अनुभव का नियम यह दर्शाता है कि उपादानकारण स्वयं अपने-आप कार्य का रूप ग्रहण नहीं कर सकता, जब तक कि किसी चेतन निमित्तकारण की प्रेरणा या नियमन उसे प्राप्त न हो। जैसे— मिट्टी में घटत्व की सम्भावना तो रहती है, किन्तु वह अपने आप घटरूप में परिणत नहीं होती। उसके लिए कुम्हारादि चेतन निमित्तकारण की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार लकड़ी, पत्थर अथवा धातु आदि पदार्थ भी चेतन प्रेरणा के बिना स्वतः किसी सुव्यवस्थित कार्यरूप में परिणत नहीं होते। अतः यह तात्त्विक सिद्धान्त सर्वमान्य प्रतीत होता है कि जड़ उपादानकारण को कार्यरूप में परिणत करने के लिए किसी चेतन, नियामक और उद्देश्यबोधयुक्त सत्ता की आवश्यकता होती है। इसी से यह निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से निकलता है कि जड़, अचेतन तथा गुणपरिणामशील प्रकृति के पीछे भी कोई सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान तथा चेतन नियन्ता सत्ता अवश्य है, जिसके अधीन रहकर प्रकृति जगत् की विविध सृष्टि-विकास प्रक्रिया को सम्पन्न करती है।
यह नियन्ता शरीरधारी जीव के समान सीमित नहीं हो सकता। क्योंकि शरीरधारण सीमितता, अवयवता तथा ज्ञान-शक्ति की संकुचितता का सूचक होता है। सूक्ष्मतम प्रकृति से इस विशाल, सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण जगत् की रचना किसी अल्पज्ञ, शरीरपरिच्छिन्न सत्ता द्वारा सम्भव नहीं मानी जा सकती। अतः वह नियन्ता शरीरातीत, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान परमात्मा ही स्वीकार किया जाना युक्तिसंगत है। उपनिषदों में भी इसी तथ्य का प्रतिपादन अत्यन्त स्पष्ट रूप से हुआ है— “न तस्य कार्यं करणं च विद्यते, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥” [श्वेताश्वतर उपनिषद् ६।८] इस मन्त्र का आशय यह है कि परमात्मा किसी बाह्य उपकरण या साधन का आश्रित नहीं है, न ही उसके तुल्य अथवा उससे श्रेष्ठ कोई सत्ता है। उसकी ज्ञान, बल तथा क्रिया ये तीनों शक्तियाँ स्वाभाविक, अनादि और स्वतः सिद्ध हैं। अतः जगत् की रचना, पालन तथा संहार उसके लिए किसी बाह्य साधन या शरीरी उपकरण पर निर्भर नहीं है।
इसके अतिरिक्त यह भी स्मरणीय है कि “निमित्तकारण सदैव शरीरी ही होता है” यह प्रतिज्ञा भी सार्वत्रिक नहीं है। अदृष्ट, दैव या कर्मसंस्कार आदि को भी अनेक दार्शनिक प्रणालियाँ निमित्तकारण के रूप में स्वीकार करती हैं, किन्तु वे स्वयं शरीरी नहीं होते। इससे यह सिद्ध होता है कि निमित्तकारण के लिए शरीरीत्व अनिवार्य शर्त नहीं है।
॥ कर्ता अकर्ता पर विचार॥
पूर्वपक्ष— ईश्वर अकर्ता है इसलिए सृष्टि रचना नहीं करता।
सिद्धांत— अकर्ता होने से सृष्टि रचना नहीं कर सकता यह आपको कहाँ से मालूम हुआ? क्या आप अकर्ता का अर्थ यह लेते हैं कि जो कुछ करता ही ना हो? यह तो अकर्ता की परिभाषा नहीं है। संभव है आप पर 'चुटकीदीपिका' की छाप पड़ी हो। जिस कारण आपके मस्तिष्क ने अपने आपको उसके अधीन कर उसकी स्वकल्पित परिभाषा को सांख्य की परिभाषा बना मानने को विवश किया। और यदि ऐसी ही बात है तब तो मूल सांख्य मे जीव को भी अकर्ता कहा है। पुनः वह कैसे प्रकृति से सान्निध्य करता है? और सृष्टि बनता है? क्योंकि जब जीव निष्क्रिय है पुनः वह प्रकृति के पास जा नहीं सकती और ना ही प्रकृति चेतन है कि जीव को अपने पास बुलाए और कहे चलो दोनों मिल के सृष्टि बनाते हैं? जब दोनों ही अकर्ता हैं तब किसी का भी सान्निध्य हो सृष्टि तो नहीं बनेगी। क्योंकि आपकी कर्ता-अकर्ता की परिभाषा के अनुसार उसका कर्तापन नष्ट हो जाएगा। प्रथमतः तो आप सांख्य के नाम पर ‘प्रदूषण’ मानते हैं अर्थात् सांख्य सिद्धांत से विरूद्ध ग्रंथों का अवलोकन करते हैं जिस कारण आपको कर्ता-अकर्ता की सांख्याऽनुमोदित ठीक परिभाषा ज्ञात नहीं। और ना जानने के कारण आपने इतना बखेड़ा खड़ा कर दिया है जिसकी कोई सानी नहीं। अस्तु।
अकर्ता का अर्थ करते हुए साक्षात् भगवान् कपिल के प्रशिष्य ‘भगवत्पाद महर्षि पञ्चशिख’ लिखते हैं—
अयन्तु खलु त्रिषु गुणेषु कर्त्तषु अकर्त्तरि च पुरुषे तुल्यातुल्यजातीये चतुर्थे तत्क्रियासाक्षिण्युपनीयमानान् सर्वभावानुपपन्नाननुपश्यन् न दर्शनमन्यच्छंकते॥ १८॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र १८]
भाष्य— (अयन्तु खलु) निश्चित ही यह जीवात्मा (त्रिषु गुणेषु कर्तृषु) त्रिगुणात्मक प्रकृति के विश्वरूप में परिणत हो जाने पर (अकर्त्तरि च पुरुषे तुल्यातुल्यजातीये चतुर्थे) अपरिणामी उस चतुर्थ पुरुष (तत्क्रियासाक्षिण्युपनीयमानान्) जगन्नियन्ता व समस्त जगत् की क्रियाओं के साक्षी परमात्मा में (सर्वभावानुपपन्नाननुपश्यन्) अपनी सम्पूर्ण भावनाओं को समर्पण कर उसीमें अपनी उन कामनाओं को सम्पन्न-सिद्ध जानता हुआ (न दर्शनमन्यच्छंकते) अन्य किसी दर्शन अपेक्षित ज्ञेय की आशंका सम्भावना नहीं रखता।
यहाँ महर्षि पञ्चशिख ने प्रकृति एवं उसके अंगभूत तीन गुण सत्त्व, रजस् और तमस् को 'कर्ता' कहा है। और 'कर्ता' का अर्थ यहाँ 'परिणामी तत्त्व' है। अर्थात्, जो तत्त्व निरन्तर परिवर्तनशील है, एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदल रहा है, वही इस दृष्टि से 'कर्ता' है। प्रकृति इसी अर्थ में परम कर्ता है, क्योंकि वह अव्यक्त सूक्ष्म अवस्था से व्यक्त स्थूल विश्वरूप में निरन्तर परिणत होती रहती है। यह परिणाम-क्रिया उसका स्वभाव है।
इसके विपरीत, पुरुष चेतन तत्त्व को 'अकर्ता' कहा गया है। यहाँ 'अकर्ता' का तात्पर्य 'अपरिणामी' होना है। पुरुष नित्य, अविकारी और अपरिवर्तनशील है। वह किसी भी प्रकार के रूपान्तरण या गुण-परिवर्तन से मुक्त है। अतः, परिणाम की क्रिया में वह कर्ता नहीं है। देखो इसके अगले सूत्र में इसी भाव को भगवान पञ्चशिख ने कहा है—
अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतति॥ १९॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र १९]
'भोक्तृशक्ति' अर्थात् अनुभव करने वाला सामर्थ्य जो चेतन जीवात्म-पुरुष है निश्चित ही अपरिणामी है। 'परिणाम' का अर्थ है रूपान्तरण, विकार या परिवर्तन। प्रकृति और उसके समस्त विकार महत् (बुद्धि), अहंकार, पंचतन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ एवं भूत सभी परिणाम के अधीन हैं। वे एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तित होते रहते हैं। इसके विपरीत, पुरुष सर्वथा अपरिणामी है। वह न तो जन्म लेता है, न बढ़ता है, न विकसित होता है, न ही नाश को प्राप्त होता है। उसका चैतन्य-स्वरूप नित्य, अविकारी और शाश्वत है।
देखिए कपिल महराज भी इसी बात को अपने सूत्रों में यों बखान करते हैं—
कैवल्यार्थ प्रवृत्तेश्च॥ १४४॥ [षष्टितन्त्र १/१४४]
अर्थात् मोक्ष के लिए पुरुष की प्रवृत्ति देखी जाती है।
यहां तो कपिल ऋषि ने स्पष्टतः जीवात्मा को प्रवृत्ति वाला कथन किया है। यह तो रही सांख्य की कर्ता-अकर्ता की परिभाषा। कहिए आप कौन सा सांख्य मानते हैं? यहां यह भी स्मरण रहे कि जीवात्मा को यहां ‘भोक्ता’ कहा है भोक्ता वही हो सकता है जो कर्म करे। जैसाकि [षष्टितन्त्र १/१४३] में कहा है- ‘भोक्तृभावात्’। अर्थात् भोक्ता होने से पुरुष देहादि से भिन्न है।
पुनः आपका माना हुआ अकर्ता तो धरा का धरा रह गया। क्योंकि अकर्ता कि यदि आप अपनी स्वकल्पित परिभाषा लेते हैं तो वह आप सांख्य पर ना थोपे। सांख्य की परिभाषा अलग है जो मैं उपरोक्त सूत्र में कह आया हूँ। इति॥
[विशेष— किन्तु एक गहनतर स्तर पर, वह क्रिया के प्रति 'स्वातंत्र्य' रखने के कारण कर्ता है। अर्थात्, वह स्वयं परिणत न होकर भी, परिणति की समस्त प्रक्रिया का साक्षी, प्रेरक और उद्देश्य है। वह अन्य तत्त्व अर्थात त्रिगुणात्मक प्रकृति को परिणति के लिए प्रेरित करता है। यह कर्तृत्व का वह विशिष्ट रूप है जो केवल चेतन में ही सम्भव है वह प्रेरित करता है किन्तु स्वयं प्रेरित नहीं होता, वह देखता है किन्तु स्वयं दृष्टि का विषय नहीं बनता। इस प्रकार, प्रकृति परिणाम के अर्थ में कर्ता है, जबकि पुरुष प्रेरणा के अर्थ में कर्ता है।]
तथा ‘अयन्तु खलु’ इस सूत्र मे भगवान पञ्चशिखाचार्य ईश्वर का भी कथन कर रहें हैं, सूत्र में ‘अयन्तु खलु’ पद के द्वारा प्रथम जीवात्मा का ग्रहण कर त्रिगुणात्मक प्रकृति के सापेक्ष उसकी स्थिति का विवेचन किया गया है, और तत्पश्चात् एक चतुर्थ पुरुष का निर्देश मिलता है, जो साधारण पुरुष से भिन्न, विशिष्ट सत्ता का द्योतक है। और उस चतुर्थ पुरुष की तुलना जीवात्मा से करते हुए भगवान् पञ्चशिखाचार्य ‘तुल्यातुल्यजातीये’ यह शब्द पढ़ते हैं अर्थात् जो चौथा पुरुष है वह जीवात्मा से ‘तुल्यातुल्यजातीये’ है अर्थात् कुछ गुणों में दोनों समान है तथा कुछ में असमान।
यहां जीवात्मा से अतिरिक्त एक और पुरुष परमात्मा का कथन है क्योंकि जीव और परमात्मा में ही ‘तुल्यातुल्यजातीये’ हो सकता है जैसे जीव और परमात्मा दोनों ही चेतनस्वरूप, अपरिणामी, अकर्ता तथा अजर-अमर तत्त्व हैं इस दृष्टि से वे तुल्यजातीय हैं। किन्तु जहाँ परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता, सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान है, वहीं जीवात्मा अल्पज्ञ, सीमित सामर्थ्य वाला तथा देहाध्यास से ग्रस्त होकर एकदेशी अनुभव में स्थित होता है। परमात्मा कभी देहबन्धन में आबद्ध नहीं होता, जबकि जीव कर्मवश देह, इन्द्रिय और अन्तःकरण के साथ सम्बन्ध स्थापित करता हुआ संसारचक्र में प्रवृत्त दिखाई देता है। अतः इन विशिष्ट भेदों के कारण दोनों अतुल्यजातीय भी सिद्ध होते हैं। जब स्वयं कपिल परम्परा के प्रामाणिक आचार्य पञ्चशिखाचार्य इस प्रकार जीव से अतिरिक्त एक परम पुरुष की प्रतिष्ठा करते हैं, तब यह प्रतिपादन करना कि सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी है, वस्तुतः दर्शन की मूल धारा से विमुख होने के समान प्रतीत होता है। पुनः आप क्योंकर कह सकते हैं कि सांख्य ईश्वरवादी नहीं है? आप किस सांख्य के अनुयायी हैं? उस सांख्य के जिसकी आधारशिला कपिल, आसुरि और पञ्चशिख जैसे महर्षियों ने रखी? या उस सांख्य के जिसे उत्तरकालीन मतभेदों और आंशिक व्याख्याओं ने अपने-अपने आग्रहों के अनुरूप रूपान्तरित कर दिया?
यदि परम्परागत सांख्य को ही प्रमाण मानते हैं तो उसके प्रामाणिक आचार्यों के मतों की उपेक्षा करने का सीधा अर्थ है कि आप कपिलप्रोक्त सांख्य नहीं मानते। और यदि आप किसी परिवर्तित सांख्य को ही स्वीकार करते हैं, तो उसे सांख्य-परम्परा का अंतिम और सर्वमान्य स्वरूप बताना भी न्याय की दृष्टि से संगत नहीं कहा जा सकता। मूल बात यह है कि आपको सोने से अधिक ‘मायावाद’ रूपी जंग लगा लोहा पसंद है।
ऐसी स्थिति में यह कहना अनुचित न होगा कि सांख्य को निरीश्वरवादी सिद्ध करने का आग्रह कहीं ऐसा प्रयास तो नहीं, जिसमें शास्त्र के मूल तत्त्व को उसके व्याख्यात्मक आवरणों के भीतर विलीन कर दिया गया हो? क्योंकि परम्परा का अनुसरण करना और परम्परा की संज्ञा का उपयोग करके उसके तत्त्व को परिवर्तित कर देना ये दोनों सर्वथा भिन्न बातें हैं। आप यह भ्रम तो मिटा ही देंवे कि आप सांख्य परम्परा के अनुयायी हैं। तथापि आपको तो ‘सांख्यनाशक’ की संज्ञा देना अधिक उचित रहेगा। अस्तु।
आगे षष्टितंत्र में भगवान कपिल कहते हैं—
तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत्॥ ९६॥ [षष्टितन्त्र १/९६]
भाष्य— इस सूत्र का गूढ़ार्थ यह है कि जिस प्रकार अयस्कान्तमणि के समीप होने मात्र से लोहद्रव्य में गति और आकर्षण की चेष्टा उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार चेतन ईश्वर की सन्निधि से प्रकृति में जगत्-रचना की प्रवृत्ति जागृत होती है। यहाँ विशेष रूप से यह संकेत किया गया है कि जड़, अचेतन तथा स्वतः उद्देश्यशून्य प्रकृति अपने-आप किसी सुव्यवस्थित जगत् की रचना करने में समर्थ नहीं हो सकती। उसमें कार्योत्पादन की प्रवृत्ति तभी सम्भव है, जब किसी चेतन, सर्वज्ञ तथा नियामक सत्ता का अधिष्ठान उसे प्राप्त हो।
यहाँ एक शंका उपस्थित की जा सकती है कि ‘तत्सन्निधान’ शब्द से ईश्वर का ही ग्रहण क्यों किया जाए? जीवात्मा का ग्रहण क्यों न मान लिया जाए? इस सम्भावित आपत्ति का समाधान स्वयं भगवान् कपिल अगले सूत्र में प्रदान करते हैं—
विशेषकार्येष्वपि जीवानाम्॥ ९७॥ [षष्टितन्त्र १/९७]
भाष्य— इस सूत्र का अभिप्राय यह है कि चेतनस्वरूप होने के कारण जीवात्माओं में भी कुछ विशिष्ट कार्यों का अधिष्ठातृत्व पाया जाता है जैसे शरीर, इन्द्रिय, मन आदि की क्रियाओं का नियमन। जीव अपने कर्मसंस्कारों के अनुसार इन उपकरणों के माध्यम से व्यवहार करता है, अतः इन सीमित उपाधियों के क्षेत्र में उसका अधिष्ठातृत्व स्वीकार किया जाता है।
किन्तु जीवात्मा अल्पज्ञ, सीमित शक्ति वाला तथा कर्मवश बन्धनग्रस्त होने के कारण प्रकृति के सार्वभौम नियन्ता के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो सकता। प्रकृति के सूक्ष्मतम तत्त्वों से लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का समन्वय, संचालन और सृष्टि-विकास केवल ऐसी सत्ता द्वारा सम्भव है, जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान तथा सर्वव्यापक हो।
तात्पर्य यह है कि जीव का अधिष्ठातृत्व आंशिक और विशेष कार्यों तक ही सीमित है, न कि सम्पूर्ण प्रकृति पर। यदि ‘तत्सन्निधान’ शब्द से जीव का ही ग्रहण अभिप्रेत होता तो ‘विशेषकार्येष्वपि जीवानाम्’ जैसे पृथक् सूत्र की रचना सर्वथा निरर्थक सिद्ध होती। क्योंकि उस स्थिति में जीव का प्रकृति तथा शरीर दोनों का अधिष्ठातृत्व उसी पूर्वसूत्र से सिद्ध हो जाता। परन्तु भगवान् कपिल ने जीव के अधिष्ठातृत्व को पृथक् रूप से निर्दिष्ट कर यह स्पष्ट कर दिया कि ‘तत्सन्निधान’ में जिस अधिष्ठाता सत्ता का संकेत है, वह जीव से भिन्न, उच्चतर तथा सर्वव्यापक नियन्ता ईश्वर ही है।
इस प्रकार इन दोनों सूत्रों के परस्पर सम्बन्ध का सूक्ष्म परीक्षण यह सिद्ध करता है कि सांख्य परम्परा में प्रकृति की स्वतन्त्र, अचेतन सत्ता को स्वीकार करते हुए भी उसके पीछे एक परम चेतन अधिष्ठाता का प्रतिपादन अन्तर्निहित रूप से विद्यमान है। भगवान् कपिल की यह व्यवस्था अत्यन्त संतुलित है। जिसमें जीव की सीमित चेतन सत्ता और परमात्मा की सर्वाधिष्ठाता सत्ता, दोनों का समुचित स्थान निर्धारित किया गया है। परन्तु ‘सांख्य नाशक’ आदि शब्दों से स्मरणीय कुछ मूढ़ लोगों ने भगवान् कपिल के इस मत को दूषित कर उनपर और उनकी रचना पर अनीश्वरवाद का आरोप किया है।
आगे पुनः—
व्यावृत्तोभयरूपः॥ १६०॥ [षष्टितन्त्र १/१६०]
भाष्य— अर्थात् जो प्रकृति तथा जीव इन दोनों के स्वरूप से सर्वथा पृथक् है, वही परमात्मा है। यहाँ ‘उभयरूप’ से प्रकृति और पुरुष (जीव) का ग्रहण किया गया है, तथा ‘व्यावृत्त’ शब्द द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि परमात्मा इन दोनों से भिन्न, विलक्षण और उच्चतर सत्ता है।
संसारचक्र अनादि प्रवाहरूप से संचालित होता रहता है। प्रकृति परिणामि-नित्य है अर्थात् वह सद्रूप तो है, किन्तु गुणपरिणाम के कारण विकारगामी है। जीव अथवा पुरुष कूटस्थ-नित्य है वह अपरिवर्तनशील सच्चित्स्वरूप है, किन्तु सीमित अनुभव में स्थित रहता है। परन्तु परमात्मा इन दोनों से भिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वाधिष्ठाता, सर्वकर्त्ता, सर्वसंहर्ता तथा अनन्त गुणों का भण्डार है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध मन्त्र— “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया…” [ऋ० १/१६४/२०] में भी यही तत्त्व प्रतिपादित हुआ है कि एक ही वृक्ष (प्रकृति) में दो पक्षी स्थित हैं एक (जीव) कर्मफल का भोक्ता है और दूसरा (ईश्वर) साक्षी, व्यापक और नियन्ता रूप में स्थित है। इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर न प्रकृति है और न ही केवल जीव, अपितु दोनों से विलक्षण परम सत्ता है।
इसी भेद को और स्पष्ट करते हुए षष्टितन्त्र में कहा गया है—
साक्षात्सम्बन्धात् साक्षित्वम्॥ १६१॥ [षष्टितन्त्र १/१६१]
भाष्य— अर्थात् परमात्मा का प्रकृति और जीव के साथ सम्बन्ध इन्द्रियजन्य या बाह्य साधनों पर आश्रित नहीं है, अपितु उसका सम्बन्ध प्रत्यक्ष, स्वतन्त्र तथा अन्तर्यामित्वस्वरूप है। यह सम्बन्ध स्वस्वामिभाव अथवा शरीर-शरीरीभाव के रूप में समझा जाता है। जैसाकि वृहदारण्यकोपनिषद् के अन्तर्यामीब्राह्मण में कथन किया है कि “यः पृथिव्यांतिष्ठन् पृथिव्यामन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरम्॥ जो पृथिवी में रहता है और पृथिवी का अन्तर्यामी है जिसको पृथिवी नहीं जानती, जिस का पृथिवी शरीर है। इस प्रकार इस सम्बन्ध को शरीर शरीरीभाव सम्बन्ध भी कहते हैं।
इसके उपरान्त परमात्मा की एक और विशिष्टता प्रतिपादित की जाती है—
नित्यमुक्तत्वम्॥ १६२॥ [षष्टितन्त्र १/१६२]
भाष्य— वह परमात्मा सदा मुक्त स्वभाव है। परमात्मा सर्वथा स्वतन्त्र होने से नित्यमुक्तस्वभाव है अर्थात् उस परमात्मा का कोई स्वामी नहीं और वह किसी के बन्धन में नहीं आता।
वह परमात्मा नित्यमुक्त क्यों है ? उत्तर—
औदासीन्यं चेति॥ १६३॥ [षष्टितन्त्र १/१६३]
भाष्य— अर्थात् परमात्मा अभोक्ता है, फलाकाङ्क्षा से रहित है। इसलिए उसे उदासीन कहा गया है। वह सर्वकामपूर्ण होने से किसी प्रयोजन की पूर्ति हेतु कर्म में प्रवृत्त नहीं होता। अतः वह बन्धन से सर्वथा परे रहता है।
यहाँ एक शंका उठ सकती है कि जब परमात्मा नियमुक्त और उदासीन है, तब वह जगत् का कर्ता कैसे माना जा सकता है? उत्तर—
उपरागात्कर्तृत्वंचित्सानिध्यात्चित्सानिध्यात्॥ १६४॥ [षष्टितन्त्र १/१६४]
भाष्य— अर्थात् ईश्वर निमित्तकारण है और प्रकृति उपादानकारण। परमात्मा की चेतन सन्निधि से प्रकृति में कार्योत्पादन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। ईश्वर प्रयोजक या गौण कर्ता है, जबकि प्रकृति परिणामी होने के कारण मुख्य कार्यकारण रूप में कार्य करती है। यही सिद्धान्त गीता में भी प्रतिपादित है “प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः…” [गीता ३।२७] अर्थात् समस्त क्रियाएँ प्रकृति के गुणों द्वारा ही सम्पन्न होती हैं।
इस प्रकार सांख्य का संतुलित मत यह है कि सृष्टि के लिए प्रकृति और परमात्मा दोनों का समन्वित कारणत्व स्वीकार करना चाहिए। इत्यादि प्रथम अध्याय में ईश्वर को सृष्टि कर्ता आदि सांख्यकार ने कथन किया है।
शंका— क्या पता यह नित्यमुक्त आदि जीवात्मा के लिए कथन किया हो?
उत्तर— आपकी शंका सर्वथा निर्मूल और निन्दनीय है क्योंकि जब जीवात्मा स्वभावेण नित्यमुक्त ही है पुनः बन्धन में आ नहीं सकता। स्वभावविरुद्ध स्थिति का होना दार्शनिक दृष्टि से असम्भव माना गया है। स्वयं षष्टितन्त्र में कहा गया है—
न स्वभावतो बद्धस्य मोक्षसाधनोपदेश विधिः॥ ७॥ [षष्टितन्त्र १/७]
भाष्य— त्रिविध दुःख सम्बन्ध का नाम “बन्ध" है, यदि वह स्वाभाविक हो तो शास्त्रोक्त मोक्ष के उपाय विवेकज्ञान के अनुष्ठान में पुरुष की प्रवृत्ति नहीं होसक्ती। क्योंकि यह नियम है कि जो वस्तु अपने प्रयनसाध्य तथा मुख का साधन होती है उसी के सम्पादन करने में पुरुष अवृत्त होता है और दुःख सम्बन्धरूप बन्ध का स्वाभाविक होने के कारण विवेकज्ञान से निवृत्त होना असम्भव है, अतएव उसको स्वाभाविक मानना ठीक नहीं।
इसी को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है—
स्वभावस्यानपायित्वादननुष्ठानलक्षणमप्रामाण्यम्॥ ८॥ [षष्टितन्त्र १/८]
भाष्य— स्वभावभूत वस्तु की निवृत्ति का असम्भव होने से निवृत्ति का बोधक शास्त्र (अप्रामाण्यम्) अप्रमाणिक होजाता है।
तात्पर्य यह है कि स्वभावभूत वस्तु की निवृति असंभव है अतः जीवात्मा स्वाभाविक मुक्त हो नहीं सकता। यदि हो तो बंधन में नहीं आ सकता। अतः यह ‘नित्यमुक्तत्वम्’ किसी अन्य के लिए ही कहा गया है। चूंकि जीवात्मा स्वाभाविक मुक्त नहीं है और प्रकृति जड़ है तो यह वर्णन इनसे भिन्न परमात्मा का ही है।
आगे कपिल महराज षष्टितंत्र अध्याय दो में लिखते हैं—
प्रकृतिवास्तवे च पुरुषस्याध्याससिद्धिः॥ ५॥ [षष्टितन्त्र २/५]
भाष्य— (प्रकृतिवास्तवे) वस्तुतः प्रकृति के उपादानकारण होनेपर (च) भी (पुरुषस्य) ईश्वर की (अध्याससिद्धिः) अधिष्ठानरूप से उपादान कारणता की सिद्धि है।
तात्पर्य यह है कि प्रथम अध्याय में “तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वम्…” इस सूत्र द्वारा जिस ईश्वर की सिद्धि की गई है, वह अधिष्ठाता सर्वनियन्ता, सर्वव्यवस्थापक तत्त्व है। वहाँ यह प्रतिपादित हुआ कि ईश्वर के सन्निधान से ही प्रकृति और उसके विकारों में क्रियाशीलता आती है। उसके बिना जड़ प्रकृति में न तो प्रवृत्ति है, न व्यवस्था। इस प्रकार ईश्वर का अधिष्ठानरूप, नियामकस्वरूप सिद्ध किया गया है। अब जब श्रुति में यह कहा जाता है कि “ईश्वर से आकाश आदि तत्त्वों की उत्पत्ति हुई” तो यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि ईश्वर स्वयं पदार्थरूप में परिवर्तित होकर आकाश, वायु आदि बन गया। ऐसा मानना न तो तर्कसंगत है और न ही पूर्व सिद्ध अधिष्ठातास्वरूप ईश्वर के अनुरूप। वास्तविक स्थिति यह है कि प्रकृति उपादान कारण है अर्थात् जगत् के नामरूपात्मक तत्त्व उसी से प्रकट होते हैं। और ईश्वर निमित्त कारण है वह प्रेरक, नियन्ता और अधिष्ठाता है, जो प्रकृति को उद्देश्यपूर्ण सृष्टिव्यवस्था में प्रवृत्त करता है। प्रकृति जड़ है, उसमें सृजन की सामग्री तो है, परन्तु योजना और संकल्प नहीं। ईश्वर चेतन है, उसमें संकल्प और ज्ञान है। परन्तु वह स्वयं जड़ पदार्थ में परिणत नहीं होता। इसी सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि प्रकृति “ईश्वर का शरीरभूत” है। जैसे शरीर आत्मा के अधीन रहकर उसके द्वारा संचालित होता है, वैसे ही प्रकृति ईश्वर की अधीन शक्ति है उसकी कार्यशक्ति, उसकी अभिव्यक्ति का क्षेत्र है। इस दृष्टि से जब श्रुति कहती है कि “ईश्वर से आकाश की उत्पत्ति हुई” तो उसका आशय यह है कि ईश्वर की अधिष्ठानसत्ता और संनिधान के कारण, उसकी अधीन प्रकृति से आकाश आदि तत्त्वों का आविर्भाव हुआ।
चेतनोद्देशान्नियमः कण्टकमोक्षवत्॥ ७॥ [षष्टितन्त्र २/७]
भाष्य— (कण्टकमोक्षवत्) कण्टक से छूटने की भांति (चेतनोद्देशात्) ईश्वर की प्रेरणा से (नियम:) बद्ध मुक्त के प्रति प्रकृति सृष्टि का नियम पाया जाता है।
और “कण्टकमोक्षवत्” जैसे काँटे से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य सचेत प्रयास करता है, वैसे ही बन्धन से मुक्त होने की समूची प्रक्रिया भी चेतन प्रेरणा के अधीन है। जब किसी के पैर में काँटा चुभता है, तो वह स्वतः नहीं निकल जाता। पीड़ा का बोध होता है, फिर उसे निकालने का संकल्प होता है, फिर साधन का प्रयोग होता है। यह पूरी प्रक्रिया चेतन उद्देश्य से चलती है न कि काँटा स्वयं हट जाने की किसी अन्धी प्रवृत्ति से।
बहुधा यह आपत्ति उठाई जाती है कि “सांख्य में तो विवेकज्ञान से मुक्ति होती है। प्रकृति स्वयं पुरुष के लिए अनुभव और अपवर्ग का साधन बनती है। फिर ईश्वर का प्रयोजन क्या रहा? यदि सब कुछ केवल प्रकृति पर छोड़ दिया जाए, तो कर्मफलनियम, जीवों की यथायोग्य गति, और मोक्ष की व्यवस्था ये सब कैसे सुनिश्चित होंगे? कर्म फल का निर्णय आगे करेंगे।
भगवान् कपिल यहाँ स्पष्ट करते हैं कि चेतन के उद्देश्य से ही नियम की प्रतिष्ठा है। किस चेतन के उद्देश्य से? आपके मत मे तो आप जीव को मानते हैं नियम का प्रतिष्ठाता जबकि वो हो नहीं सकता क्योंकि कर्मफल देना सृष्टि की व्यवस्था करना यह बद्ध जीव कर नहीं सकता और मुक्त को आवश्यकता ही क्या है? क्योंकि उसको तो ‘जगदव्यापारवर्ज’ कहा है। और ऐसा भी नहीं है कि केवल एक ही मुक्त जीव हो मुक्त जीव बहुत सारे हैं। उन्मे से किसको सृष्टि बनाने की आवश्यकता आन पड़ी यह भी आप निश्चय नहीं कर सकते और यदि मान लेते हैं तो जिस प्रकार आप सृष्टि रचने के कारण ईश्वर बन्धन में आ गया यह कहते हैं तो आपका यह तर्क आपके ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के लिए काफी है क्योंकि फिर तो आपका माना हुआ अनन्त मुक्त जीव अनन्त मुक्ति छोड़ आपको मारने दौड़ेगा। अतः जीवों को अपने कर्मों का फल भोगना है।
उन्हें अनुभवों के माध्यम से परिपक्व होना है। उन्हें अन्ततः विवेकज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाना है। यह सम्पूर्ण व्यवस्था एक व्यापक नियमन-सत्ता की अपेक्षा रखती है। यही वह स्थान है जहाँ ईश्वर की अधिष्ठाता-सत्ता अनिवार्य सिद्ध होती है। स्पष्ट कपिल ऋषि ने अपने इस सूत्र रूपी ज्वालाओं से सगर पुत्र रूपी नास्तिकों को एक ही पल में भस्म कर दिया है।
पुनः—
न्ययोगेऽपितत्सिद्धिनञ्जस्येनायोदाहवत्॥ ८॥ [षष्टितन्त्र २/८]
भाष्य— जिस प्रकार अयोदहति=लोह जलाता है, यहां पर अग्नि के सम्बन्ध से लोह में दाहकत्व व्यवहार की सिद्धि होती है इसी प्रकार प्रकृति के सम्बन्ध से ईश्वर में कर्त्तृत्व पाया जाता है उपादान कारणत्व नहीं।
आशय है जैसे हम व्यवहार में कहते हैं कि “लोहा जलाता है”, किन्तु वस्तुतः दाहकत्व लोहे का स्वभाव नहीं, अपितु अग्नि के संसर्ग से उसमें प्रकट हुआ गुण है; उसी प्रकार सृष्टि-व्यवहार में ईश्वर का कर्तृत्व कहा जाता है। जब लोहे का टुकड़ा अग्नि में रख दिया जाता है, तो वह लाल हो उठता है, तप्त हो जाता है, और किसी वस्तु को स्पर्श करे तो उसे दग्ध कर देता है। तब सामान्य व्यवहार में हम कहते हैं “लोहे ने जला दिया।” पर दाहकत्व का तत्त्व तो अग्नि में है; लोह केवल उसका आश्रय बना है। अग्नि का तेज उसमें संचारित हुआ है, इसलिए वह दाहक प्रतीत होता है। यदि अग्नि का संसर्ग न हो, तो वही लोह शीतल और अदाहक रहता है। इसी प्रकार सृष्टि के व्यवहार में ईश्वर को “कर्ता” कहा जाता है। श्रुति कहती है उससे आकाशादि की उत्पत्ति हुई। पर यहाँ “कर्ता” होने का अर्थ यह नहीं कि ईश्वर स्वयं पदार्थरूप में परिणत होकर जगत् बन गया। उपादान कारण तो प्रकृति है जगत् का वास्तविक द्रव्य-तत्त्व। ईश्वर का कर्तृत्व उसके साथ सम्बन्ध से प्रतिष्ठित है।
अब आगे सृष्टि का स्वरूप कथन करते हुए लिखते हैं—
रागविरागयोर्योगःसृष्टिः॥ ९॥ [षष्टितन्त्र २/९]
भाष्य— भोगादि का सम्पादक होने से प्रकृति का नाम "राग” और प्रकृति कृत भोगादि की वासना से रहित होने के कारण ईश्वर को "विराग" कहते हैं, इन दोनों का स्वस्वामिभाव तथा प्रेर्य्य प्रेरकभाव सम्बन्ध सृष्टि का हेतु होने से “सृष्टि" कहलाता है।
तीसरे अध्याय में पुनः भगवान कपिल प्रकृति को पराधीन कथन करते हैं—
अकार्य्यत्वेपितद्योगःपारवश्यात्॥ ५५॥ [षष्टितन्त्र ३/५५]
भाष्य— (अकार्यत्वे, अपि) प्रकृति किसीका कार्य न होने पर भी (पारवश्यात्) पराधीन होने से (तद्योगः) उसका योग प्रकृ तिलय पुरुष के साथ होजाता है।
तात्पर्य यह है कि प्रकृति ईश्वर के अधीन है ना कि स्वतंत्र जैसा कि नास्तिक लोग कथन करते हैं।
शंका— प्रकृति परमात्मा के अधीन कैसे हो सकती है ? उत्तर—
स हि सर्ववित्सर्वकर्ता॥ ५६॥ [षष्टितन्त्र ३/५६]
भाष्य— क्योंकि (स, हि) वह परमात्मा (सर्ववित्) सर्वज्ञ होने से (सर्वकर्त्ता) सब संसार की रचना करने वाला है।
प्रकृति निस्सन्देह अपरिमित शक्ति से युक्त है। वह महती है, अनादि है, त्रिगुणात्मक है, और समस्त नाम-रूप-प्रपञ्च का उपादान-भूत आधार है। किन्तु शक्ति और स्वातन्त्र्य समानार्थक नहीं। जड़ शक्ति में स्वप्रेरणा नहीं होती, उसमें न तो संकल्प है, न ज्ञान, न ही न्याय-विवेक है। अतः यदि प्रकृति को पूर्ण स्वतन्त्र मान लिया जाए, तो सृष्टि में जो सुव्यवस्थित क्रम, कारण-कार्य-संबन्ध, कर्मफल-न्याय और जीवों की विविध गति दृष्टिगोचर होती है, उसका युक्तिसंगत स्पष्टीकरण सम्भव नहीं रहता।
इसी प्रसंग में ब्रह्मसूत्र का वचन— “रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्” (२।१।१) विशेष स्मरणीय है। वहाँ यह प्रतिपादित किया गया है कि केवल अनुमान या जड़ तत्त्व की स्वचालित प्रवृत्ति से सृष्टि-रचना की उपपत्ति नहीं बैठती। रचना का अर्थ है उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था, साधन-साध्य-संबन्ध की संगति। अतः जड़ प्रकृति अपने आप सृष्टि-विन्यास का आरम्भ नहीं कर सकती; उसे चेतन अधिष्ठाता की आवश्यकता है। “सर्ववित्” पद का विशेष महत्त्व है। जो सर्वज्ञ है, वही समस्त तत्त्वों का, समस्त जीवों के कर्मों का, उनके संस्कारों और भावी प्रवृत्तियों का यथार्थ ज्ञान रखता है। वह कर्मानुसार जीवों की यथोचित स्थिति-नियुक्ति भी है। यह व्यवस्था केवल उसी के द्वारा सम्भव है जो सब कुछ जानता है।
“सर्वकर्ता” पद का अभिप्राय भी उपादान-परिणामत्व नहीं, अपितु नियामक-निमित्तत्व है। उपादान कारण प्रकृति है जगत् का द्रव्य-तत्त्व उसी से प्रकट होता है। किन्तु उस द्रव्य को उद्देश्यपूर्ण सृष्टि-रूप में प्रतिष्ठित करने वाला, उसके प्रवाह को नियमबद्ध करने वाला, कर्मफल-व्यवस्था को संचालित करने वाला परमात्मा है। इसी कारण प्रकृति, यद्यपि महती और अपरिमित शक्ति-सम्पन्न है, तथापि परमात्मा के अधीन कही गई है।
शंका— ‘सर्ववित्’ और ‘सर्वकर्त्ता’ जैसे पदों का उच्चारण मात्र किसी अमुक सत्ता को स्वतः ईश्वर सिद्ध नहीं करता, अपितु इससे इतना निष्पन्न होता है कि जो सत्ता सर्वज्ञता आदि गुणों से सम्पन्न हो, वही ईश्वर कहलाने योग्य है। उत्तर—
ईदृशेश्वरसिद्धिःसिद्धा॥ ५७॥ [षष्टितन्त्र ३/५७]
भाष्य— (ईदृशेश्वरसिद्धिः) सर्वज्ञादि गुणयुक्त ईश्वर की सिद्धि (सिद्धा) वैदिक ईश्वर की सिद्धि सिद्ध होती है।
कहने का अर्थ यह है कि ‘सर्ववित्’ और ‘सर्वकर्त्ता’ कहने से यह प्रतिपादित होता है कि ऐसे गुणों से सम्पन्न सत्ता ईश्वर ही हो सकती है, जीव नहीं। यद्यपि योगबल से जीव में सर्वज्ञता का कुछ अंश प्रकट हो सके, तथापि सर्वकर्तृत्व आदि सार्वभौम गुण उसकी सत्ता में कदापि सिद्ध नहीं होते। इसी भाव को “जगद्व्यापारवर्जम्” (ब्र० सू० ४।४।१७) में स्पष्ट किया गया है कि साधनसम्पन्न होने पर भी जीव का ऐश्वर्य जगत् की उत्पत्ति आदि सार्वत्रिक व्यापार का अधिकारी नहीं बनता। यही बात सांख्यप्रवचनभाष्य में भगवान व्यासदेव ने भी कहा है। अतः यह कहना कि सांख्य का ईश्वर ‘मुक्तजीव’ विशेष को कहते हैं मूर्खतापूर्ण है।
आक्षेप- सांख्य में ईश्वर माना ही नहीं जा सकता क्योंकि उसका वहां कोई काम नहीं है उत्तर—
न ईश्वराधिष्ठितेफलनिष्पत्तिःकर्मणातत्सिद्धे॥ २॥ [षष्टितन्त्र ५/२]
भाष्य— (ईश्वराधिष्ठिते) ईश्वर के ओधिष्ठाता होन पर ही (फलनिष्पत्तिः) फलकी सिद्धि होती है (कर्मणा) केवल कर्मद्वारा (नःतत्सिदधेः) फल की सिद्धि (न) नहीं होने से।
कर्मफल होने के कारण अधिष्ठाता के बिना स्वयं फल नहीं देसक्ते इसलिये कथ फल दाता ईश्वर मानना आवश्यक है। लोक में भी यही व्यवस्था दृष्टिगोचर होती है। किसी राज्य में विधि-विधान हो सकते हैं, दण्ड-संहिता लिखी हो सकती है, परन्तु न्यायाधीश और शासक के बिना वे नियम स्वतः दण्ड-वितरण नहीं करते। नियम पुस्तक में निहित रहता है; उसके प्रवर्तन के लिए चेतन अधिकार-शक्ति आवश्यक होती है। इसी प्रकार शुभाशुभ कर्म नियमरूप हैं, परन्तु उनके यथायोग्य फल का विधान करने वाला चेतन अधिष्ठाता ईश्वर अनिवार्य है। इसी प्रकार विहित ओर निषिद्ध कर्मों का फल दाता ईश्वर है।
कुछ आक्षेपकर्ता यह अर्थ ग्रहण करते हैं कि कर्म स्वयं फल देता है, ईश्वर की आवश्यकता नहीं। परन्तु यही व्याख्या सूत्र के प्रतिपाद्य के विपरीत है। यदि “न” का प्रयोग ईश्वर-निषेधार्थ किया जाए, तो शेष वाक्य का तात्पर्य असंगत हो जाता है। यहाँ निषेध कर्म की स्वतन्त्र फलदाता-शक्ति का है, न कि ईश्वर-सत्ता का।
इन आक्षेप कर्ता नास्तिकों की बुद्धि देखिए इन्होंने जो सूत्र का अर्थ लापन यों किया है कि कर्म अपने आप फल दे देतें है ईश्वर की आवश्यकता नहीं। इनकी बुद्धि का नमूना देखिए कि यहां इस सूत्र में तथा ईश्वरसिद्धिः सूत्र में ये उस परमात्मा की असिद्धि लापन करते हैं। यहां निषेध में ये वही ईश्वर मानेंगे जो मुक्तात्मा से भिन्न है। परन्तु जहां सांख्य में इदृशेश्वरसिद्धि कहा है वहां ये ईश्वर शब्द से मुक्तात्मा कथन करते हैं बलिहारी हो बुद्धि की। इस प्रकार से तो ईश्वर+असिद्धि सूत्र में भी मुक्तात्मा माना जा सकता है कि सांख्यशास्त्र कार मुक्तात्मा का निषेध कर रहे हों? तो क्या यह युक्तिसंगत होगा? स्पष्टतः नहीं।
आगे और भी युक्ति देते हुए लिखते हैं—
स्वोपकारादाधेष्ठानंरोकवत्॥ २॥ [षष्टितन्त्र ५/३]
भाष्य— (लोकवत्) लोक में राजा की भांति (स्वरापकारात्) जीवों पर उपकार करने से (अधिष्ठानं) ईश्वर कर्मों का अधिष्ठाता है।
अर्थात् लोक में जैसे राजा का व्यवहार होता है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिए। राजा का व्यक्तिगत कोई स्वार्थ न भी हो, तथापि वह प्रजाजन के हित के लिए शासन करता है, व्यवस्था बनाये रखता है, दण्ड और पुरस्कार का विधान करता है। उसका अधिष्ठान व्यक्तिगत प्रयोजन से नहीं, अपितु लोक-व्यवस्था और उपकार की भावना से होता है। इसी प्रकार ईश्वर भी जीवों के कर्मों का अधिष्ठाता है “स्वोपकारात्” अथवा “स्वरापकारात्” का आशय यहाँ यह है कि जीवों पर उपकार करने की वृत्ति से। ईश्वर को स्वयं कुछ प्राप्त करना शेष नहीं; वह पूर्ण है, सिद्ध है, सर्वज्ञ है। अतः सृष्टि-रचना या कर्मफल-विधान उसके किसी अभाव-पूर्ति के लिए नहीं है।
योग दर्शन में भी कथन किया है— ‘तस्यात्मानुग्रहामावेऽपिभूतानुग्रहप्रयोजनम्’ [व्यासभाष्य १। २५] अर्थात् ईश्वर को अपने लिए किसी अनुग्रह की आवश्यकता नहीं, तथापि भूतमात्र के अनुग्रह के लिए उसका प्रयोजन है। जीव अनादिकाल से कर्मबन्धन में आबद्ध हैं। उनके शुभाशुभ संस्कारों का संचय, उनके अनुभवों की आवश्यकता, और अन्ततः विवेकज्ञान की प्राप्ति इन सबकी एक क्रमबद्ध व्यवस्था है। इस व्यवस्था का संचालन एक सर्वज्ञ अधिष्ठाता के बिना सम्भव नहीं। राजा लोकहितार्थ शासन करता है; वह नियम इसलिए बनाता है कि प्रजा का संरक्षण और कल्याण हो। उसी प्रकार ईश्वर कर्मों का अधिष्ठाता है ताकि जीव अपने कर्मानुसार फल पाकर परिपक्व हों, अनुभव से शिक्षित हों, और अन्ततः मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हों।
यदि कहो कि ईश्वर का जीवों पर उपकार पाया जाता है तो उसका भी अवश्य कोई अपना प्रयोजन होगा? उत्तर—
लौकिकेश्चरवदितरथा॥ ४॥ [षष्टितन्त्र ५/४]
भाष्य— जैसे प्रजा पर उपकार करने से राजा का अपना भी प्रयोजन सिद्ध हो जाता है क्योंकि प्रजा के हित से वह अपनी अनेक कामनाओं की पूर्ति करता है वैसे ईश्वर के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। वह तो ‘पर्याप्तकाम’ है, उसे किसी स्वार्थ की अपेक्षा नहीं।
ईश्वर को आप्तकाम क्यों माने उसके मानने में क्या प्रयोजन है? उत्तर—
पारिभाषिको वा॥ ५॥ [षष्टितन्त्र ५/५]
भाष्य— (वा) यदि ईश्वर को आप्तकाम न माना जाय तो वह (पारिभाषिकः) नाममात्र का ईश्वर होगा।
यदि यह भी मान लिया जाए कि कर्मों के अधिष्ठाता होने से ही उनके फलों की सिद्धि होती है, तब भी इससे ईश्वर की सिद्धि अनिवार्य नहीं मानी जा सकती; क्योंकि अधिष्ठाता का होना सामान्यतः किसी प्रकार के राग अथवा प्रवृत्ति के बिना संभव नहीं माना जाता। इसी आशय से पूर्वपक्षी यह शंका उपस्थित करता है—
न रगादृतेतत्सिद्धि प्रतिनियत कारणत्वात्॥ ६॥ [षष्टितन्त्र ५/६]
भाष्य— (प्रतिनियत कारणत्वात्) प्रवृत्तिमात्र में नियमसे राग कारण होता है, इसलिए (रागात, ऋते) राग के बिना (तत्सिद्धिः) ईश्वर के अधिष्ठातृत्र की सिद्धि (न) नही हो सक्ती।
इस शंका का समाधान करते हुए भगवान कपिल लिखते हैं—
तद्योगेऽपि न नित्यमुक्तः॥ ७॥ [षष्टितन्त्र ५/७]
भाष्य— (तद्योगे) इच्छारूप राग के होने पर (अपि) भी (नित्यपुक्तः) नित्यमुक्त ईश्वर (न) दूषित नहीं हो सक्ता।
भावार्थ यह है कि ‘पर्याप्तकाम’ होने से ईश्वर की इच्छा किसी स्वार्थ-साधन के लिए नहीं होती। अपितु “स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च” इस श्रुतिवचन के अनुसार उसकी ज्ञान, बल और क्रिया-शक्तियाँ स्वभावतः ही सिद्ध हैं। उपनिषद्-वाक्यों में ईश्वर की इच्छा को स्वाभाविक माना गया है, अतः उसके अधिष्ठातृत्व में कोई बाधा नहीं आती। और जीव की भाँति उसमें राग का अभाव होने पर भी उसके ईश्वरत्व में किंचित् भी न्यूनता नहीं होती।
वादी पुनः शंका करता है—
प्रधानशक्तियोगात्संगापत्तिः॥ ८॥ [षष्टितन्त्र ५/८]
भाष्य— (चेत्) यदि (प्रधानशक्तियोगात्) ईश्वर में प्रधान विषयक रागरूप शक्ति के योग से इच्छा मानी जाय तो (सङ्गापत्तिः) उसमें सङ्ग अर्थात् रागरूप दोष बना रहेगा।
सत्तामात्राच्चेतसर्वैश्वर्य्यम्॥ ९॥ [षष्टितन्त्र ५/९]
भाष्य— (चेत्) यदि (सत्तामात्रात्) सत्तामात्रा से इच्छा मानी जाय तो (सर्वैश्वर्य्यम्) सब को ईश्वर मानना पड़ेगा।
उक्त शंका का समाधान करते हैं—
प्रमाणाभावान्नतत्सिदिः॥ १०॥ [षष्टितन्त्र ५/१०]
भाष्य— (प्रमाणाभावात्) प्रमाण के न होने से (तत्सिदिः) ईश्वर के रागयुक्त तथा पदार्थमात्र ईश्वर होने की सिद्धि (न) नही होसक्ती।
प्रकृति के साथ योग होने मात्र से ईश्वर को संसारी या रागयुक्त मान लेना युक्तिसंगत नहीं है। क्योंकि उसके रागी होने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जिन कारणों से सामान्यतः प्रत्यक्ष सिद्ध होता है, वे यहाँ नहीं पाये जाते। अतः प्रत्यक्ष-प्रमाण से यह बात सिद्ध नहीं होती। और शब्दप्रमाण से भी केवल इतना ही प्रतिपादित होता है कि ईश्वर का प्रकृति के साथ योग स्वामिभाव-सम्बन्ध के रूप में है, न कि रागादि-दोषयुक्त संयोग के रूप में।
सिर्फ सत्ता-मात्र के योग से प्रत्येक पदार्थ को ईश्वर मान लेना भी उचित नहीं, जैसे सर्वव्यापक आकाश की सत्ता सब स्थानों में विद्यमान होते हुए भी घटादि व्याप्य पदार्थ आकाशस्वरूप नहीं हो जाते, उसी प्रकार ईश्वर की व्यापक सत्ता सर्वत्र व्याप्त होने पर भी व्याप्य वस्तुएँ ईश्वर नहीं हो सकतीं।
वादी पुनः कहता है की ईश्वर का रागी होना अनुमान से सिद्ध है। उत्तर—
सम्बन्धाभावान्नानुमानम्॥ ११॥ [षष्टितन्त्र ५/११]
भाष्य— (सम्बन्धाभावात्) सम्बन्ध न होने से (अनुमानम्) अनुमान प्रमाण भी (न) नही हो सक्ता।
कहने का तात्पर्य यह है कि ‘प्रयोजनवत्त्व’ को आधार बनाकर ईश्वर में राग-दोष की सिद्धि करना युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि स्वार्थरूप प्रयोजन का लिङ्ग ईश्वर से किसी प्रकार संबद्ध नहीं पाया जाता। वह ‘पर्याप्तकाम’ है, अतः उसमें अपनी किसी कामना-पूर्ति का प्रसंग ही नहीं उठता। इसलिए उसे जीव के समान रागयुक्त मानना उचित नहीं। अतएव वादी द्वारा प्रस्तुत अनुमान ‘हेत्वसिद्धि’ नामक दोष से दूषित होकर हेत्वाभास सिद्ध होता है; साथ ही उसमें ‘अपर्याप्तकामत्व’ की उपाधि भी निहित है, जिससे वह तर्क सर्वथा असंगत ठहरता है। इत्यादि।
पुनः वादी कहता है प्रकृति के साथ जो आपने स्वस्वामीभाव सम्बन्ध वर्णन किया है उसका प्रमाण क्या है? उत्तर—
श्रुतिरपिप्रधानकार्य्यत्वस्य॥ १२॥ [षष्टितन्त्र ५/१२]
भाष्य— (प्रधानकार्य्यत्वस्य) प्रकृति का कार्य ईश्वराधीन इस विषय में (श्रुतिः, अपि) श्रुति भी प्रमाण है।
अर्थात् कपिल महर्षि का स्पष्ट मत है कि जो वेदों में कहा है वह ही हमें अभीष्ट है। वेदों में प्रकृति के साथ ईश्वर का स्वस्वामीभाव सम्बन्ध बहुधा वर्णन किया है “स भूमिञ्जनयन्देव एकः” [यजु १७। १९] इत्यादि श्रुतियों में स्पष्ट प्रतिपादित है कि प्रकृति का कार्यरूप परिणमन ईश्वराधीन है, वह स्वतन्त्र नहीं। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ईश्वर अपनी प्रकृतिरूप शक्ति के द्वारा जगत् की सृष्टि करता है; इस प्रकार वह निमित्त कारण है और प्रकृति उपादान कारण। जो सत्ता अपनी शक्ति से कार्य की उत्पत्ति करे और स्वयं अपने स्वरूप में किसी विकार को ग्रहण न करे, वह ‘निमित्त कारण’ कहलाती है; तथा जो अपने अवयवों के रूपान्तर से कार्य का निर्माण करे, वह ‘उपादान कारण’ कही जाती है। ‘अपि’ शब्द के प्रयोग से यह भी सूचित होता है कि कर्ता के बिना कार्य की सिद्धि असम्भव है। इस प्रकार इस विषय में श्रुति के साथ तर्क-प्रमाण भी संगत रूप से उपलब्ध है।
यदि केवल विज्ञानस्वरूप या किसी विशेष सम्बन्ध की कल्पना से ही ईश्वर की सिद्धि मान ली जाए, तो फिर उसे नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है? उत्तर—
नाविद्याशक्तियोगो निःसंगस्य॥ १३॥ [षष्टितन्त्र ५/१३]
भाष्य— (निःसंगस्य) असङ्ग ब्रह्म के साथ (अविद्याशक्तियोगः) अविद्या की शक्ति का योग (न) नहीं होसक्ता। इत्यादि अनेकों स्थान पर भगवान कपिल ने अपने ग्रंथ षष्टितंत्र में ईश्वर का स्पष्ट उल्लेख किया है तथा उन शंकाओं को भी निवृत किया है जो आज कल के नवीन फर्जी सांख्य पुस्तकों के नाम पर फैलाया जाता है। आगे भगवान कपिल अनिर्वचनीय अविद्यावादी के मत में दोष गिनवाते हुए कहते हैं—
विद्यातोऽन्यत्वे ब्रह्मबाधप्रसङ्गः॥ १६॥ [षष्टितन्त्र ५/१६]
भाष्य— (विद्यातः) विद्या से (अन्यत्वे) भिन्न मानने पर (ब्रह्मबाधप्रसङ्गः) ब्रह्म का बाध होगा।
अर्थात जैसे विद्या के द्वारा, विद्या से भिन्न अविद्या की निवृत्ति स्वीकार की जाती है, उसी प्रकार यदि ब्रह्म को भी विद्या से भिन्न माना जाए, तो तुम्हारे मतानुसार उसका भी विद्या द्वारा बाध होना मानना पड़ेगा; क्योंकि जो वस्तु विद्या से भिन्न है, वह उसके ज्ञान के उदय पर अविद्या के समान निरस्त हो सकती है। अब इससे स्पष्ट क्या प्रमाण चाहिए?
॥ वेद स्वतःप्रमाण॥
पुनः वेद को अपौरुषेय कहते हैं—
न त्रिभिरपौरुषेयत्वाद् वेदस्य तदर्थस्यातीन्द्रियत्वात्॥ ४१॥ [षष्टितन्त्र ५/४१]
भाष्य— (अपौरुषेयत्वात्) अपौरुषेय अर्थात ईश्वर रचिर होने से और (तदर्थस्यातीन्द्रियत्वात्) उसके अर्थ को अतीन्द्रिय होने से (त्रिभिः) तीन प्रमाणों से (वेदस्य) वेदार्थ की प्रतीति (न) नहीं होती।
निजशक्तिर्युत्पत्या व्यवच्छिद्यते॥ ४३॥ [षष्टितन्त्र ५/४३]
भाष्य— (निजशक्तिः) शब्दार्थ का ईश्वरीय सङ्केत (व्युत्पत्या) बुद्धि से (व्यवच्छिद्यते) जाना जाता है।
इस सामान्य नियम के अनुसार जो भी कार्यरूप है वह अनित्य होता है। अतः यदि वेदों को कार्य माना जाए, तो कार्यत्व के कारण उन्हें भी अनित्य स्वीकार करना पड़ेगा। इसी अभिप्राय से पूर्वपक्षी यह आशंका उपस्थित करता है—
न नित्यत्वं वेदानां कार्य्यत्वश्रुतेः॥ ४५॥ [षष्टितन्त्र ५/४५]
भाष्य— (कार्य्यत्वश्रुतेः) कार्य्यत्व पाए जाने से (वेदानां) वेदों की (नित्यत्वं) नित्यता (न) नहीं होसक्ती।
कोई यह आक्षेप कर सकता है कि कार्य होने से वेद तो जीव (मुक्तात्मा) ने रचे हैं इसका समाधान लिखते हैं—
न पौरुषेयत्वं तत्कर्तुः पुरुषस्याभावात्॥ ४६॥ [षष्टितन्त्र ५/४६]
भाष्य— (तत्कर्त्तुः) वेदों का कर्त्ता (पुरुषस्य) जीव के (अभावात्) न होने से (पौरुषेयत्वं) वेद कार्यरूप (न) नहीं।
वेदों का कोई मानव-कर्त्ता नहीं है, अतः वे कार्यरूप नहीं माने जा सकते; अपितु वे ईश्वरीय ज्ञानस्वरूप होने से नित्य हैं। क्योंकि जो ज्ञान ईश्वर का है, वह नित्य और अविनाशी होता है। इसी भाव को “एतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेवैतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः” (बृहदारण्यक २।४।१०) में व्यक्त किया गया है— कि उस महान् ब्रह्म का यह श्वासरूप ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद है। अर्थात् जैसे श्वास-प्रश्वास स्वाभाविक रूप से प्रकट होते हैं, वैसे ही सृष्टि के आदि में ईश्वर से वेदों का आविर्भाव होता है।
शंका— वेदों का कर्ता जीव क्यों नहीं हो सकता? उत्तर—
मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात्॥ ४७॥ [षष्टितन्त्र ५/४७]
इस सूत्र में दो पद हैं— मुक्तामुक्तयोः। अयोग्यत्वात्। मुक्त अर्थात् जो जीव मोक्ष पा चुका है और अमुक्त जो जीव बद्ध है। दोनों ही वेदों के कर्ता नहीं हो सकते क्यों? क्योंकि वो अयोग्यत्वात् अयोग्य हैं। उनमें इतनी योग्यता ही नहीं है कि वो वेद को रच सके अतः इन मुक्त और अमुक्त से भिन्न एक तीसरा पुरुषविशेष है वह ही इसका रचयिता है। आगे सूत्र में उस तीसरे परमात्मा का उल्लेख करते हैं—
निजशक्तयभिव्यक्तेः स्वतःप्रामाण्यम्॥ ५१॥ [षष्टितन्त्र ५/५१]
भाष्य— (निजशक्तयभिव्यक्तेः) ईश्वरकी स्वाभाविकशक्ति द्वारा प्रकट होने से (स्वतःप्रामाण्यम्) वेद स्वतःप्रमाण हैं।
जैसे सूर्य अपने प्रकाश से स्वयं प्रकट होता है और अन्य को प्रकाशित करता है, वैसे ही ईश्वर की सर्वज्ञ शक्ति से वेद प्रकट होते हैं और धर्मतत्त्व का प्रकाश करते हैं। चूँकि मुक्त और अमुक्त जीव की अयोग्यता पूर्व सूत्र में प्रतिपादित हो चुकी है, अतः यहाँ “निजशक्ति” का आश्रय उसी परमात्मा में ग्रहण करना संगत है। वही सर्वज्ञ है, अतः धर्माधर्म, अदृष्ट, मोक्षमार्ग और परमसत्य का यथार्थ बोध रखता है। वही सर्वकर्ता है, अतः जगत्-व्यवस्था के अनुकूल वाङ्मय का प्रकटीकरण कर सकता है। और वही अनादि है, अतः उसके द्वारा अभिव्यक्त वेद का प्रामाण्य भी परतन्त्र नहीं, स्वतःसिद्ध है। कपिल ऋषि तो यहाँ तक कहते हैं कि—
श्रुतिविरोधान्नकुतर्कापसदस्यात्मलाभः॥ ३४॥ [षष्टितन्त्र ६/३४]
भाष्य— (श्रुतिविरोधात्) श्रुति के विरोध से (कुतर्कापसदस्य) वेदविरोधि तर्क से दूषित पुरुष को (आत्मलाभः) आत्मा की प्राप्ति (न) नहीं होसक्ती। इति॥
पुनः—
समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता॥ ११६॥ [षष्टितन्त्र ५/११६]
भाष्य— (समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु) समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष में जीव (ब्रह्मरूपता) ब्रह्म के आनन्दादि धर्मों को अपने में को धारण कर लेता है।
अब जो लोग सांख्य को एकरेखीय निरेश्वरवाद का पर्याय बताकर अपने को तत्त्ववेत्ता घोषित करते हैं, वे इस सूत्र को देखकर कुछ असहज अवश्य होंगे। जब स्वयं सूत्रकार “ब्रह्मरूपता” कह रहे हैं, तब उसे अनदेखा कर केवल अपने पूर्वग्रह को पोषित करना मूढ़ता है।
यदि हर बार “ईश्वर” या “ब्रह्म” पद को किसी प्रकार खींचतान कर अन्य अर्थ में ढाल दिया जाए, तो फिर शास्त्र का कोई निश्चित अर्थ शेष ही न रहेगा। यह प्रवृत्ति उस विद्यार्थी के समान है जो प्रश्नपत्र में स्पष्ट लिखे उत्तर को छोड़कर अपनी सुविधा का उत्तर लिख दे और फिर मूल्यांकन पर दोषारोप करे। यहाँ तक षष्टितंत्र में प्रतिपादित ईश्वर का उल्लेख किया गया।
॥ भगवत्पाद महर्षि पञ्चशिख और ईश्वर॥
तस्मिस्तमसि क्षेत्रज्ञ एव प्रथमोऽध्यवर्त्तत॥ २॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र २]
भाष्य— तम की अवस्थिति में क्षेत्रज्ञ ही प्रथम अधिष्ठातारूप से विद्यमान था। यहाँ ‘क्षेत्रज्ञ’ शब्द का प्रयोग हुआ है ‘क्षेत्र’ का अर्थ है यह समग्र देह अर्थात् प्रकृति। ‘ज्ञ’ का अर्थ है जानने वाला। उस तमरूपीप्रकृति का जानने वाला परमात्मा ही है। क्योंकि जीव उसे नहीं जान सकता जीव के लिए प्रकृति की वह अवस्था अव्यक्त है। क्योंकि जीव का ज्ञान सदा व्यक्त जगत् से सम्बन्धित होता है। वह अव्यक्त, मूल प्रकृति की उस आद्यावस्था का प्रत्यक्ष ज्ञाता नहीं हो सकता।
जीव का चैतन्य देह-उपाधि से सम्बद्ध है, और सृष्टिपूर्व तमोमय अव्यक्त अवस्था में देहादि का ही अभाव है। अतः उस अवस्था का साक्षी कोई सीमित जीव नहीं हो सकता। अतः यहाँ “क्षेत्रज्ञ” पद का ग्रहण व्यापक अर्थ में करना होगा उस परम चेतन अधिष्ठाता के रूप में, जो प्रकृति की अव्यक्तावस्था में भी साक्षिरूप से स्थित है। वही प्रथम है अर्थात् सृष्टि-प्रपञ्च से पूर्व भी जिसकी सत्ता है। वही अधिष्ठाता है अर्थात् जिसके सन्निधान से प्रकृति का प्रवर्तन सम्भव होता है। अतः जब सब कुछ तमोमय अव्यक्त था, तब भी वह परम साक्षी विद्यमान था। वही प्रथम अधिष्ठाता है, वही प्रकृति का जानने वाला है, और उसी के कारण सृष्टि-प्रवर्तन की संभावना निहित है।
ईश्वर की विद्यमानता कहने के उपरांत महर्षि पञ्चशिख अगले सूत्र में उसी ईश्वर से अधिष्ठित हो प्रधान की प्रवृति होती है इसका प्रतिपादन करते हैं—
पुरुषाधिष्ठितं प्रधानं प्रवर्त्तते॥ ३॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र ३]
भाष्य— अर्थात् प्रधान—जो प्रकृति का ही पर्याय है पुरुष के अधिष्ठान से प्रवृत्त होता है।
यहाँ “प्रधान” शब्द प्रकृति की उस मूल, त्रिगुणात्मक, अव्यक्त सत्ता का बोधक है, जो समस्त सृष्टि का उपादान-कारण है। वह अनादि है, शक्तिसम्पन्न है, किन्तु जड़ है। उसमें स्वप्रेरणा का अभाव है। इसीलिए कहा गया “पुरुषाधिष्ठितम्।” उसके अधिष्ठान, उसके सन्निधान, उसके नियामक-संबन्ध से ही प्रधान में प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। जैसे चुम्बक की उपस्थिति में लौहकण विशेष प्रकार से व्यवस्थित हो जाते हैं, वैसे ही पुरुष-सन्निधान में प्रधान का साम्यभंग होकर सृष्टि-प्रवाह आरम्भ होता है। इसी अर्थ का प्रतिपादन महर्षि कपिल ने इस ‘तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत्॥ ९६॥ [षष्टितंत्र १/९६]’ सूत्र में कर दिया था। महर्षि पञ्चशिख का वचन इस सूत्र की व्याख्या ही समझनी चाहिए।
पुनः—
महदादिविशेषान्तः सर्गो बुद्धिपूर्वकत्वात्॥ १४॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र १४]
भाष्य— (महदादिविशेषान्तः)‘महत्’ से प्रारंभ कर ‘विशेष'-पर्यन्त, जो (सर्गो) सर्ग है, वह (बुद्धिपूर्वकत्वात्) बुद्धिपूर्वक होने से ही सम्भव है।
सांख्य के कुछ आलोचकों ने यह भ्रान्त धारणा बना ली है कि सांख्य में सर्वज्ञ चेतन के किसी प्रेरक अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया, किन्तु यह प्रवाद यथार्थ से सर्वथा भिन्न है। यदि यह मान लिया जाए कि यह सम्पूर्ण विश्व केवल जड़ उपादान-तत्त्व की स्वतन्त्र प्रवृत्ति से ही बना है, तो इतनी विस्तृत, सुनियोजित एवं संयत व्यवस्था कैसे सम्भव हो सकती है? पृथिवी का सूर्य के चारों ओर निश्चित परिधि में परिभ्रमण, चन्द्रमा की पृथिवी के चारों ओर स्थिति, ग्रहों-नक्षत्रों की यथावत् दूरी और उनका संतुलित परिचालन यह सब एक नियामक और सूझ-बूझवाले बुद्धितत्त्व के अस्तित्व को प्रमाणित करता है। जड़ उपादान तत्त्व में न तो विवेक-शक्ति होती है, न संवेग का उचित नियमन करने की क्षमता। केवल चेतन प्रेरणा के अधीन होकर ही वह इस प्रकार की व्यवस्था को धारण कर सकता है।
सांख्य के अनुसार प्रकृति से सर्वप्रथम परिणाम होता है ‘महत् तत्त्व’, इसके पश्चात् इससे ‘अहंकार’ तत्त्व उत्पन्न होता है। अहंकार से द्विविध परिणाम प्रकट होते हैं तैजस और वैकारिक रूपों से इन्द्रियाँ तथा मन। तामस रूप से तन्मात्र तत्त्व। ‘तन्मात्र’ तत्त्व से पंचमहाभूत उत्पन्न होते हैं। यही पंचमहाभूत ‘विशेष’ के अन्तर्गत आते हैं। अतः सूत्र का “महदादिविशेषान्तः” पद महत् से लेकर पंचमहाभूतों तक की समग्र तत्त्व-श्रृंखला का द्योतक है। यही वह रचना है जिसे ‘सर्ग’ कहा गया है और यही सर्ग बुद्धिपूर्वक कहा गया है, तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उस बुद्धि का आश्रय कोई परम चेतन सत्ता है जो प्रकृति से भिन्न है, पर उसके अधिष्ठाता रूप में स्थित है। अर्थात् परमपिता परमात्मा द्वारा प्रकृति रूपी उपादान से यह समस्त चराचर जगत् उत्पन्न किया गया।
आगे महर्षि पञ्चशिख उस ईश्वर के द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति का बहुत ही अद्भुत वर्णन करते हुए लिखते हैं—
उत्पन्नकार्यकरणस्तु माहात्म्यशरीर एकाकिनमात्मानमवेक्ष्याभिदध्यौ हन्ताहं पुत्रान् स्त्रक्ष्ये ये मे कर्मकरिष्यन्ति ये मां परञ्चापरञ्च ज्ञास्यन्ति॥ १५॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र १५]
भाष्य— (उत्पन्नकार्यकरणस्तु) जिसने तन्मात्र, महाभूत, अहंकार, महत्, इन्द्रिय आदि समस्त कार्य (परिणाम) तथा करण की उत्पत्ति कर दी है, अर्थात् सम्पूर्ण कार्य-करण-समूह का कारण बना है, वह कौन है? कहते हैं (माहात्म्यशरीर) वह माहात्म्यरूप वाला है, अर्थात् गुणमय महत्ता से युक्त, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है वह परमेश्वर, परब्रह्म ही है। (एकाकिनमात्मानमवेक्ष्याभिदध्यौ) उस परमात्मा ने सृष्टि के आदि में जब अन्य कोई जीव या जगत् प्रकट न था तब स्वयं को एकाकी रूप में देखकर सृष्टि का संकल्प किया (हन्ताहं) ‘अहो!’ या ‘हन्त!’ यह आनंदोद्गार है जैसे सृष्टि-संकल्प के क्षण में परमेश्वर का हर्षोद्गार हो (पुत्रान् स्त्रक्ष्ये) मैं ऐसे पुत्रों जीवों की रचना करूँगा जो मेरी सृष्टि के भावी अंग होंगे (ये मे कर्मकरिष्यन्ति) वे जीव जो मेरे विधान के अनुसार मुझ तक पहुँचने हेतु कर्म करेंगे अर्थात् जो धर्म, यज्ञ, तप, सेवा आदि द्वारा मुझमें प्रवृत्त होंगे (ये मां परञ्चापरञ्च ज्ञास्यन्ति) और वे ज्ञानी, जो मेरे ‘पर’ (अविकार, सर्वोत्कृष्ट, ब्रह्मस्वरूप) तथा ‘अपर’ (सृष्टिकर्ता स्वरूप) दोनों तत्त्वों को तत्त्वतः जानेंगे।
यह बताता है कि इस विश्व की उत्पत्ति केवल जड़ पदार्थों के संयोग से नहीं हुई, न ही यह कोई यदृच्छा या अन्धा संयोग है अपितु इसके मूल में एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, आनन्दस्वरूप परम चेतन तत्त्व का सुविचारित संकल्प विद्यमान है। कि जिसने महत्, अहंकार, तन्मात्र, महाभूत, इन्द्रियाँ आदि सृष्टि के समस्त कार्य-करण-समूह को उत्पन्न किया, वही मूल कारण है। यहाँ ‘कार्य’ का तात्पर्य है जो तत्त्व परिणामस्वरूप प्रकट हुए पंचमहाभूत, देह, प्रपंच आदि। ‘करण’ का तात्पर्य है जिनके माध्यम से कार्यों का संचालन होता है इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि। इन सबका निमित्त एक ही है परमेश्वर। यहाँ शास्त्रकार इस तथ्य पर बल देते हैं कि इस सृष्टि का न कोई अकारण उद्गम हुआ है इसके पीछे एक मूल चेतन तत्त्व का सुविचारित संकल्प ही प्रधान है। इस संकल्प का वर्णन श्रुति में बहुधा हुआ है।
‘माहात्म्य’ शब्द का अर्थ है ‘महान् गुणों से युक्त’, ‘असीम महत्ता वाला’। अथवा माहात्म्यशरीरः” वह परम तत्त्व जिसके लिए सम्पूर्ण चराचर जगत् शरीर के समान है। अर्थात् जिस प्रकार देह में आत्मा अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर देह का धारक, नियन्ता एवं प्रेरक होता है वैसे ही सम्पूर्ण जगत् परमात्मा का शरीर है, और परमात्मा उसका अन्तर्यामी।
उपनिषद भी इसी अर्थ को कहती है बृहदारण्यक उपनिषद् (३.७.३) “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरः। यं पृथिवी न वेद। यस्य पृथिवी शरीरम्। यः पृथिव्यामन्तरो यमयति स आत्मान्तर्याम्यमृतः।” जो पृथिवी में स्थित होकर भी पृथिवी से भिन्न है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी जिसका शरीर है, जो पृथिवी के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर पृथिवी को नियन्त्रित करता है वही अमृत, अन्तर्यामी, परमात्मा है।
सृष्टि के प्रारम्भ में अन्य कोई जीव, जगत्, काल या पदार्थ प्रकट नहीं था। केवल परमात्मा का अस्तित्व था। इसी को सूचित किया गया है “एकाकिनम् आत्मानम् अवेक्ष्य” अर्थात् परमेश्वर ने अपने को एकाकी रूप में देखा। स्वयं के अनन्त स्वरूप में स्थित परमात्मा ने अपने अस्तित्व का अवलोकन किया। इसी क्षण परमात्मा ने सृष्टि का संकल्प किया ‘अभिदध्यौ’ यह शब्द संकल्पशक्ति का परिचायक है। परमात्मा का विचार मात्र सृष्टि के प्राकट्य का कारण बन गया।
परमात्मा ने कहा “पुत्रान् स्त्रक्ष्ये” मैं पुत्रों की रचना करूँगा। यहाँ ‘पुत्र’ शब्द का अर्थ जीवों से है। परमात्मा का उद्देश्य केवल प्राणी बनाना नहीं है अपितु ऐसे प्राणियों की रचना करना है जो उसके विधान के अनुसार धर्मपरायण कर्म करेंगे। ‘ये मे कर्म करिष्यन्ति’ का अर्थ है वे जीव मेरे विधान ऋत, धर्म, नियम के अनुरूप कर्म करेंगे जिससे वे अन्ततः मुझ तक पहुँच सकें। “ये मां परञ्चापरञ्च ज्ञास्यन्ति” इस पद में दो विशेष शब्द हैं ‘पर’ और ‘अपर’। परमात्मा का कथन है कि उसके द्वारा सृष्ट किए गए जीव केवल कर्म तक सीमित न रहें, अपितु ज्ञान द्वारा उसे उसके दोनों रूपों में जानें। परमात्मा न केवल सृष्टिकर्ता (अपर रूप) है, बल्कि स्वयं साक्षात् ब्रह्म (पर रूप) भी है। ज्ञानीजन इन दोनों रूपों को तत्त्वतः जानकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
पुनः इसी सूत्र में आगे लिखते हैं—
एवं तस्माद् ब्रह्मणोऽभिध्यानादुत्पन्नः तस्मात् प्रत्ययसर्गः॥ १५॥ [कैवल्यतन्त्रम् सूत्र १५]
भाष्य— (एवम्) उक्त प्रकार से (तस्मात्) उस (ब्रह्मणः) परब्रह्म के (अभिध्यानात्) अभिध्यान से अथवा चिन्तन से (उत्पन्नः) अभिव्यक्त हुआ (तस्मात्) इस कारण से यह (प्रत्ययसर्गः) प्रत्ययसर्ग कहा जाता है।
जब भूतादि कार्य और इन्द्रियादि करण उत्पन्न हो चुके, तब चेतन आत्मा में विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, सिद्धि आदि भावनाएँ क्रमशः प्रकट होती हैं। इन भावनाओं का उदय तभी सम्भव है जब बाह्य उपकरणों का समूह पहले से उपस्थित हो क्योंकि चेतना बिना साधन के अभिव्यक्त नहीं हो सकती। अतः यह कहा गया कि ब्रह्म के अभिध्यान से भूत और इन्द्रियाँ उत्पन्न हुए, और उन्हीं की सहायता से जीवात्मा के भीतर ज्ञानजन्य प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। यही वे प्रत्यय हैं जिनका सर्ग विपर्यय से लेकर सिद्धि तक मानव की अन्तःसृष्टि कहलाता है।
अब इससे स्पष्ट सांख्य में ईश्वर का क्या प्रमाण हो सकता है। जहां स्पष्ट ‘ब्रह्मणोऽभिध्यानादुत्पन्नः’ कह दिया गया हो अब भी यदि किसी को ना दिखे तो उसे अपनी आंखे दान कर देनी चाहिए। तथा “अयन्तु खलु त्रिषु गुणेषु कर्त्तषु अकर्त्तरि च पुरुषे तुल्यातुल्यजातीये चतुर्थे...” इस सूत्र में जो ईश्वर का वर्णन है वह मैं कर्ता-अकर्ता प्रकरण में वर्णित कर आया हूँ।
आगे एक श्लोक के द्वारा पुनः ईश्वर का कथन करते हुए लिखते हैं—
यत्र तत्र संवसंस्त्रिवर्गविच्छुछिः शुचिर्हि पञ्चविंशकः। तथैव षड्विंशकत्वमवबुध्यते यदा तदा शुचिर्भवेदिति॥ [कैवल्यतन्त्रम्]
भाष्य— जो व्यक्ति कहीं भी किसी भी आश्रम मे रहकर धर्म, अर्थ और काम इन त्रिवर्गों से विरक्त रहता है, वह पञ्चविंशतितत्त्व का ज्ञाता होने के कारण वास्तव में शुद्ध कहा जाता है। और जब वह षड्विंशतत्त्व अर्थात् ईश्वर का भी बोध कर लेता है, तब वह पूर्ण रूप से शुद्ध अर्थात् मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।
॥ ब्रह्मर्षि देवल और ईश्वर॥
ब्रह्मर्षि देवल ‘असित-देवल’ के पुत्र थे महर्षि असित स्वंय सांख्य के आचार्य थे और उनके पुत्र देवल ऋषि भी सांख्य के आचार्य हुए सांख्य परम्परा में महर्षि देवल का नामोल्लेख ‘जैगीषव्य’ ऋषि के बाद आता है जैगीषव्य ऋषि स्वंय सांख्ययोग के महान आचार्य थे इनका उल्लेख ‘सांख्यप्रवचन’ भाष्य में महर्षि ‘कृष्णद्वैपायन’ ने किया है। यह ‘जैगीषव्य’ ऋषि, महर्षि ‘पञ्चशिख’ के ही समकालीन थे। महर्षि पञ्चशिख से ही इन्होने सांख्य विद्या प्राप्त करी थी। फिर उनसे देवल ऋषि ने। इस प्रकार सांख्य परम्परा के आचार्यों में ये साक्षात् भगवान् कपिल के ही अनुयायी हैं। इनका काल ‘भगवान् श्रीराम चन्द्र’ जी से भी पूर्व का है। जो कि आज से लगभग ९-१० लाख वर्ष पूर्व हुए थे। और देवल आदि ऋषि इससे भी पूर्व अर्थात् १० लाख वर्ष से भी पूर्व हुए थे। ये तो रही ब्रह्मर्षि देवल की सांख्य ज्ञान परम्परा अब उनके द्वारा प्रणीत ग्रंथ 'सांख्यप्रबोधसूत्र' में ब्रह्म अर्थात् ईश्वर विषयक कुछ उल्लेखों को देखते हैं—
ब्रह्मवादी॥ [सांख्यप्रबोधसूत्र]
भाष्य— सांख्ययोगी को चाहिए कि वह ‘ब्रह्मवादी’ हो अर्थात् ब्रह्म का विचार करने वाला और ब्रह्मतत्त्व का उपदेश देने हो। यदि देवल ऋषि सांख्य के आचार्य होकर यह निर्देश देते हैं कि “सांख्ययोगी ब्रह्मवादी हो” तो क्या आज के नवीन सांख्य वादी देवल ऋषि को सांख्य परम्परा से बाह्य बता देंगे?
त्यक्त्वा कलेवरं ध्यायन् परं याति महेश्वरम्। एकान्तात्यन्तकं साङ्ख्यं परं ब्रह्म सनातनम्॥ [सांख्यप्रबोधसूत्र]
भाष्य— सांख्ययोगी शरीर को त्यागकर मृत्यु के समय परम तत्त्व का ध्यान करता हुआ महेश्वर अर्थात ईश्वर को प्राप्त होता है। जो एकांत (पूर्ण ध्यान का प्रतीक), सभी दुखों और बंधनों का अंत करने वाला, सांख्य ज्ञान का आधार, परम ब्रह्म और सनातन (शाश्वत) है।
"साङ्ख्यं परं ब्रह्म सनातनम्" सांख्य मार्ग के द्वारा वह व्यक्ति विवेकी हो परमात्मा का साक्षात्कार करता है। यह ज्ञान व्यक्ति को उस सनातन ब्रह्म तक ले जाता है जो समय, जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे है।
तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति सांख्य ज्ञान का अनुसरण कर शरीर की आसक्ति और सांसारिक मोह-माया का त्याग करके ध्यान में लीन होता है, वह महेश्वर को प्राप्त करता है। जो सर्वोच्च ब्रह्म हैं, जो सनातन और शाश्वत सत्य हैं। इस अवस्था में पहुँचने वाला व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
॥ भगवान हारीत और ईश्वर॥
महर्षि हारीत सांख्य के ही आचार्य थे और यह भी देवल ऋषि के ही समकालीन थे सभी ने सांख्य परम्परा में इनका नामोल्लेख किया है सांख्य पर ‘मोक्षधर्मतत्त्वदर्शन’ नाम से इनका ग्रंथ प्राप्त होता है उस ग्रंथ में ईश्वर का स्पष्ट उल्लेख हुआ जो हम आगे वर्णित करेंगे।
आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वरोम्॥ [मोक्षधर्मतत्त्वदर्शन]
भाष्य— परमेश्वर (आपः) आपः, (ज्योतिः) ज्योति, (रसः) रस (अमृतम्) अमृत, (ब्रह्म) ब्रह्म, (भूः) भूः, (भुः) भुवः, (स्वः) स्वः, (ओम्) ओम् इन सब नामों वाला है।
यहाँ हारीत महर्षि ने परमेश्वर के विविध नामों का उल्लेख किया है कि एक ही अद्वितीय तत्त्व, अनेक दृष्टियों से अनेक नामों से अभिहित होता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, परन्तु नामी एक ही है। यह विविध नाम-समूह वस्तुतः परमात्मा के गुण, स्वरूप और तत्त्व की भिन्न-भिन्न झलकियाँ हैं।
‘ओम्’— यह प्रणव, समस्त वेद का बीज है। माण्डूक्योपनिषद् में इसे सम्पूर्ण जगत् का प्रतीक कहा गया है अकार, उकार और मकार से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय का बोध होता है। अतः ‘ओम्’ केवल ध्वनि नहीं, वरन् समस्त सृष्टि का सार है। उत्पत्ति, स्थिति और लय तीनों का आश्रय जो है, वही प्रणव है। इस दृष्टि से परमेश्वर का नाम ‘ओम्’ है, क्योंकि वही जगत् का आदि, मध्य और अन्त है।
‘आपः’— सामान्यतः ‘आपः’ का अर्थ जल है, परन्तु वैदिक प्रयोग में ‘आपः’ का अर्थ व्यापक तत्त्व भी है। जल सब ओर व्याप्त होकर जीवन का आधार है। उसी प्रकार परमात्मा सर्वव्यापक है, अन्तर्यामी रूप से प्रत्येक कण में प्रत्येक जीव के हृदय में प्रतिष्ठित है। जिस प्रकार जल के बिना जीवन सम्भव नहीं, वैसे ही ईश्वर-सत्ता के बिना जगत् की सत्ता असम्भव है। अतः सर्वव्यापकता के कारण वह ‘आपः’ कहलाता है।
‘ज्योतिः’— ज्योति का अर्थ है प्रकाश। सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी उसी के प्रकाश से प्रकाशमान हैं “तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्।” परमात्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप है। उसे प्रकाशित करने वाला कोई अन्य नहीं। अज्ञानान्धकार को नष्ट करने वाला जो अन्तःप्रकाश है वही परमेश्वर है। अतः वह ‘ज्योतिः’ है।
‘रसः’— उपनिषद् कहती है “रसो वै सः।” यहाँ ‘रस’ का अर्थ आनन्द का परिपूर्ण अनुभव है। भक्त के लिए परमात्मा ही परमानन्द का विषय है। जब मन संसार के विषयों से निवृत्त होकर ईश्वर में स्थित होता है, तब जो माधुर्य, जो आत्मतृप्ति अनुभव होती है, वही परम-रस है। इसीलिए परमेश्वर ‘रस’ कहा गया है वह स्वयं आनन्दस्वरूप है और आनन्द का आश्रय भी है।
‘अमृतम्’— जो मृत्यु से परे है, जो काल के अधीन नहीं वही अमृत है। देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सब परिवर्तनशील हैं। परन्तु परमात्मा नित्य, अविनाशी, अजर-अमर है। वह न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है। उसके साक्षात्कार से जीव भी अमृतत्व का अंश अनुभव करता है। अतः नित्यता और अविनाशित्व के कारण वह ‘अमृतम्’ है।
‘ब्रह्म’— ‘बृह्’ धातु से ‘ब्रह्म’ शब्द बना है, जिसका अर्थ है विस्तार, महानता। जो अनन्त है, सर्वोत्कृष्ट है, सर्वाधार है, वही ब्रह्म है। सीमित वस्तु ब्रह्म नहीं हो सकती। ब्रह्म वह है जो सब सीमाओं का अतिक्रमण करता है देश, काल और वस्तु की मर्यादाओं से परे है। अतः महानतम होने से परमेश्वर ‘ब्रह्म’ कहलाता है
‘भूः’— यह सत्स्वरूप का द्योतक है। ‘भू’ धातु का अर्थ है होना अथवा अस्तित्व। जो नित्य सत्ता है, जो सबको अस्तित्व प्रदान करता है, वही ‘भूः’ है। जगत् की प्रत्येक सत्ता उसी से आश्रित है। स्वयं वह किसी पर आश्रित नहीं। इसीलिए उसे ‘सत्’ कहा गया है।
‘भुवः’— यह चित्स्वरूप का बोध कराता है। चेतना, ज्ञान और अनुभूति का मूल स्रोत वही है। अतः परमेश्वर ‘भुवः’ है।
‘स्वः’— यह आनन्द और परम उत्कर्ष का प्रतीक है। स्वर्ग शब्द भी इसी से सम्बन्धित है, जो सुख और प्रकाश का क्षेत्र माना जाता है। परमात्मा परमानन्दस्वरूप है। उसमें दुःख, शोक या अपूर्णता का लेश भी नहीं। जो आत्मानुभूति में परमानन्द का अनुभव कराता है, वही ‘स्वः’ है।
इस प्रकार ‘ओम् भूर्भुवः स्वः’ से लेकर ‘आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म’ तक, ये सब नाम मिलकर परमात्मा के सत्-चित्-आनन्द स्वरूप का समग्र चित्र प्रस्तुत करते हैं। वह सर्वव्यापक भी है, सर्वप्रकाशक भी, आनन्दमय भी है, अमर भी, महान् भी है और अन्तरंग भी है। ऐसे परमेश्वर का हम स्तवन करते हैं उसका सूक्तिगान करते हैं। यह सब ईश्वर का वर्णन सांख्याचार्य ब्रह्मर्षि हारीत के ग्रंथ में हुआ है।
अतः भगवान् कपिल, पञ्चशिख, देवल तथा हारीत आदि सांख्याचार्य ऋषियों के प्रमाण से यहां यह सिद्ध हो चुका है कि सांख्य में ईश्वर का कहीं भी किंचित मात्र भी निषेध नहीं है अपितु सांख्य में तो ईश्वर का वर्णन बहुत अधिक विस्तृतता के साथ किया गया है।
कुछ लोग बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं “सांख्य तो निरीश्वरवादी है।” और जब पूछा जाए किस मूल ग्रन्थ में स्पष्ट निषेध है? तो उत्तर मिलता है वो ‘कारिका’ में ऐसा कहा गया है। अद्भुत। कपिल को बिना पढ़े केवल एक पंक्ति पकड़कर ‘निरीश्वर’ का झण्डा उठा लेना कोरी बकवृत्ति के अतिरिक्त कुछ नही है। कभी-कभी लगता है, कुछ लोग ऐसे हैं जैसे किसी ग्रन्थ का पहला पृष्ठ पढ़कर ही स्वयं को “सांख्याचार्य २.0” घोषित कर देते हैं। जैसे ‘कारिकाकार ईश्वरकृष्ण’।
यदि प्रकृति जड़ है पुरुष अकर्मा साक्षी है तो यह सृष्टि संयोजन किसकी व्यवस्था से चल रहा है? या फिर मान लिया जाए कि त्रिगुण स्वयं ‘टाइम-टेबल’ बनाकर ब्रह्माण्ड चला रहे हैं? और जब परम्परा में पञ्चशिख आदि आचार्य ईश्वर का उल्लेख करते हैं। तब इनका मुख पीतल के समान पीला हो जाता है ना ही इन आचार्य का ये कहीं उल्लेख करते पाए जाते हैं। यह तो वही बात हुई कि सूर्य के नीचे खड़े होकर कोई कहे 'यहाँ तो प्रकाश है ही नहीं'। सत्य तो यह है कि सांख्य रूपी वह दैदीप्यमान सूर्य सदैव विद्यमान है, किंतु सांख्यकारिका रूपी सघन मेघों ने उसकी किरणों को आपकी दृष्टि से ओझल कर दिया है। जब तक आप इन दुरव्याख्यारूपी मेघों का निवारण नहीं करेंगे, तब तक उस 'सूर्य-नारायण' के वास्तविक स्वरूप का दर्शन असंभव है।
॥ इति सांख्येश्वरनिर्णय॥

